कांपते हाथों से पहली बार उठाई थी बंदूक, आज वही IPS बना देश का सबसे खौफनाक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट—यह पंक्ति केवल एक सनसनीखेज हेडलाइन नहीं, बल्कि उस संघर्ष, संकल्प और साहस की कहानी है जिसने उत्तर प्रदेश के एक साधारण गांव से निकलकर नवनीत सिकेरा को भारतीय पुलिस सेवा का सबसे चर्चित और प्रभावशाली चेहरा बना दिया। एटा जनपद के ग्रामीण परिवेश से निकलकर यूपी पुलिस के एडीजी पद तक पहुंचने का उनका सफर जितना रोमांचक है, उतना ही प्रेरणादायक भी।
एक किसान परिवार का बेटा, हिंदी मीडियम की पढ़ाई, अंग्रेज़ी न आने का ठुकराया जाना, पारिवारिक अपमान से उपजा विद्रोह और फिर यूपी पुलिस में अपराध के साम्राज्य को तोड़ने वाला आईपीएस—नवनीत सिकेरा की कहानी बताती है कि कैसे व्यक्तिगत पीड़ा सार्वजनिक कर्तव्य में बदल सकती है।
ग्रामीण परिवेश से जन्मी दृढ़ता
22 अक्टूबर 1971 को जन्मे नवनीत सिकेरा का बचपन खेतों, मिट्टी और सीमित संसाधनों के बीच बीता। उनके पिता एक साधारण किसान थे, जिनके लिए ईमानदारी और परिश्रम ही सबसे बड़ा संस्कार था। ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों ने नवनीत को कम उम्र में ही सिखा दिया कि जीवन में आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता शिक्षा और आत्मसम्मान है।
हिंदी मीडियम से UPSC तक की कठिन राह
नवनीत सिकेरा ने प्रारंभिक शिक्षा हिंदी मीडियम स्कूल से प्राप्त की। उच्च शिक्षा के लिए वे दिल्ली पहुंचे और हंसराज कॉलेज में दाखिले का प्रयास किया, लेकिन अंग्रेज़ी में दक्षता न होने के कारण उन्हें प्रवेश नहीं मिला। यह क्षण किसी भी युवा को तोड़ सकता था, लेकिन नवनीत के लिए यही मोड़ निर्णायक साबित हुआ।
उन्होंने अंग्रेज़ी को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि चुनौती बनाया। स्वयं अध्ययन करते हुए उन्होंने तकनीकी परीक्षाओं की तैयारी की और अपनी योग्यता सिद्ध की। इसके बाद उन्होंने सिविल सेवा की ओर रुख किया और पहले ही प्रयास में यूपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण कर आईपीएस अधिकारी बने।
पुलिस बनने के पीछे छिपा दर्द
नवनीत सिकेरा के जीवन का सबसे निर्णायक क्षण तब आया, जब उनके पिता की जमीन पर दबंगों ने अवैध कब्जा कर लिया। न्याय की उम्मीद लेकर जब वे थाने पहुंचे, तो वहां उनके पिता के साथ हुई बदसलूकी ने नवनीत के भीतर गहरी आग जला दी। उसी दिन उन्होंने तय कर लिया कि वे वर्दी पहनेंगे—लेकिन सत्ता के लिए नहीं, न्याय के लिए।
एमटेक जैसी सुरक्षित और प्रतिष्ठित राह छोड़कर उन्होंने सिविल सेवा को चुना। यह निर्णय आसान नहीं था, लेकिन यही निर्णय आगे चलकर यूपी पुलिस के इतिहास में एक सख्त और निर्णायक अध्याय बना।
कांपते हाथों से पहली बंदूक
आईपीएस बनने के बाद जब पहली बार उन्हें सर्विस रिवॉल्वर सौंपी गई, तो नवनीत सिकेरा खुद स्वीकार करते हैं कि उनके हाथ कांप रहे थे। यह डर अपराधियों का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का था। कानून के नाम पर उठाई जाने वाली बंदूक की नैतिकता को वे पहले दिन से समझते थे।
एनकाउंटर स्पेशलिस्ट बनने का सफर
नवनीत सिकेरा की पहली तैनाती एएसपी के रूप में गोरखपुर में हुई। इसके बाद मुजफ्फरनगर, मेरठ, लखनऊ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई संवेदनशील जिलों में उन्होंने जिम्मेदारी संभाली। अपराधियों के खिलाफ उनकी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति ने देखते ही देखते उन्हें एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के रूप में स्थापित कर दिया।
जहां-जहां उनकी पोस्टिंग हुई, वहां संगठित अपराध की कमर टूटती चली गई। माफिया, शूटर और दुर्दांत अपराधी या तो जेल पहुंचे या जिले छोड़ने को मजबूर हुए।
रणनीति, साहस और फेक बारात
नवनीत सिकेरा केवल बल प्रयोग के लिए नहीं, बल्कि रणनीतिक सोच के लिए भी जाने जाते हैं। मेरठ में तैनाती के दौरान उन्होंने अपराधियों को पकड़ने के लिए फर्जी बारात का नाटकीय प्रयोग किया। दूल्हा-दुल्हन, बाराती—सब पुलिसकर्मी थे। बारात नकली थी, लेकिन कार्रवाई पूरी तरह वास्तविक।
कहा जाता है कि उनके ट्रांसफर की खबर पर मेरठ में लोगों ने पोस्टर तक लगवा दिए थे, ताकि उन्हें रोका जा सके। यह किसी भी पुलिस अधिकारी के लिए असाधारण जनविश्वास का संकेत था।
60 से अधिक बड़े अपराधी कानून के शिकंजे में
अपने करियर में नवनीत सिकेरा ने करीब 60 से अधिक कुख्यात अपराधियों को या तो गिरफ्तार किया या एनकाउंटर के जरिए न्याय के कटघरे तक पहुंचाया। हालांकि वे हमेशा कहते रहे कि हर कार्रवाई कानून के दायरे में और परिस्थितियों की मजबूरी में की गई।
जनता के लिए सख्त नहीं, संवेदनशील अधिकारी
जहां अपराधियों के लिए नवनीत सिकेरा खौफ का दूसरा नाम थे, वहीं आम जनता के लिए वे मददगार और संवेदनशील अधिकारी बने रहे। पीड़ितों की सुनवाई, थाने में अनुशासन और जवाबदेही—ये उनकी कार्यशैली के स्थायी स्तंभ रहे।
एडीजी पद और प्रशासनिक भूमिका
आज नवनीत सिकेरा उत्तर प्रदेश पुलिस में एडीजी (अपर पुलिस महानिदेशक) पद पर कार्यरत हैं। इस भूमिका में वे केवल फील्ड ऑपरेशन तक सीमित नहीं, बल्कि नीति निर्माण, प्रशिक्षण और आधुनिक पुलिसिंग के विस्तार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
वेब सीरीज से लोकप्रियता का नया अध्याय
नवनीत सिकेरा के जीवन और कारनामों से प्रेरित वेब सीरीज भौकाल-2 ने उन्हें एक नई पीढ़ी के बीच भी पहचान दिलाई। हालांकि उन्होंने हमेशा यह स्पष्ट किया कि वास्तविक जीवन की पुलिसिंग, किसी भी स्क्रीन प्रस्तुति से कहीं अधिक जटिल और जिम्मेदारीपूर्ण होती है।
एक संदेश, एक सीख
नवनीत सिकेरा की कहानी यह सिखाती है कि व्यक्तिगत अपमान, सामाजिक असमानता और संसाधनों की कमी भी अगर सही दिशा में ऊर्जा बन जाए, तो वह पूरे सिस्टम को बदलने की ताकत रखती है। कांपते हाथों से उठी बंदूक जब कानून और नैतिकता के साथ जुड़ जाए, तो वह डर नहीं, सुरक्षा का प्रतीक बन जाती है।






