
उत्तर प्रदेश की नौकरशाही और राजनीति के लंबे इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने पद से अधिक अपने टकरावों, असहमति और प्रतिरोध के लिए याद किए जाते हैं। पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर उन्हीं नामों में एक हैं। एक समय भारतीय पुलिस सेवा (IPS) का हिस्सा रहे अमिताभ ठाकुर आज देवरिया जिला कारागार से कफ सिरप मामले को लेकर सरकार और जांच एजेंसियों पर गंभीर आरोप लगाते नज़र आते हैं। यह रिपोर्ट उनके आईपीएस बनने से लेकर जेल पहुंचने तक के घटनाक्रम, आरोप–प्रत्यारोप, कानूनी प्रक्रियाओं और सत्ता संरचना के भीतर उठे प्रश्नों की दस्तावेज़ी और तर्कपूर्ण पड़ताल है—बिना किसी निष्कर्ष को थोपे, लेकिन सवालों को पूरी स्पष्टता के साथ सामने रखते हुए।
आईपीएस अधिकारी के रूप में शुरुआत: व्यवस्था के भीतर से उठे सवाल
अमिताभ ठाकुर का आईपीएस जीवन पारंपरिक प्रशासनिक ढांचे से अलग राह पर चलता दिखा। सेवा के शुरुआती वर्षों से ही वे पुलिस व्यवस्था, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक हस्तक्षेप पर सवाल उठाते रहे। जहाँ अधिकांश अधिकारी “संस्थागत चुप्पी” को सेवा की अनकही शर्त मानते हैं, वहीं ठाकुर ने सार्वजनिक रूप से असहमति दर्ज कराई। यही असहमति धीरे-धीरे उनकी पहचान बन गई—एक ऐसे अधिकारी की, जो आदेश पालन से अधिक संवैधानिक नैतिकता और नागरिक अधिकारों की बात करता है।
सत्ता से टकराव: विवादों की लंबी श्रृंखला
उत्तर प्रदेश में सेवा के दौरान अमिताभ ठाकुर कई बार सरकार और शीर्ष अधिकारियों से टकराते दिखे। स्थानांतरण नीति, पुलिस की कार्यप्रणाली और राजनीतिक दबाव जैसे मुद्दों पर उनके बयान प्रशासनिक हलकों में असहजता पैदा करते रहे। सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर उनकी सक्रियता ने उन्हें एक “असुविधाजनक अफ़सर” के रूप में स्थापित कर दिया। यहीं से यह मूल प्रश्न उभरता है—क्या एक आईपीएस अधिकारी का सार्वजनिक आलोचक होना सेवा नियमों का उल्लंघन है या लोकतांत्रिक जिम्मेदारी?
निलंबन से सेवा से बाहर तक: निर्णायक मोड़
विवादों की यह श्रृंखला अंततः निलंबन और फिर सेवा से बाहर किए जाने तक पहुंची। सरकार का तर्क रहा कि अमिताभ ठाकुर का आचरण सेवा नियमों के विपरीत था, जबकि ठाकुर इसे प्रतिशोधात्मक कार्रवाई बताते रहे। यह टकराव अब केवल प्रशासनिक नहीं रहा, बल्कि एक वैचारिक संघर्ष में बदल गया—एक ओर अनुशासन और पदानुक्रम, दूसरी ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जवाबदेही।
अफ़सर से एक्टिविस्ट तक: बदली भूमिका, बनी रही मुखरता
आईपीएस सेवा से बाहर होने के बाद अमिताभ ठाकुर की भूमिका बदली, लेकिन उनकी सक्रियता नहीं। उन्होंने खुद को एक सामाजिक कार्यकर्ता और सत्ता-आलोचक के रूप में स्थापित किया। पुलिस मुठभेड़ों, मानवाधिकार और जांच एजेंसियों की निष्पक्षता जैसे मुद्दों पर वे लगातार सवाल उठाते रहे। इसी सक्रियता के चलते राज्य और ठाकुर के बीच की दूरी और गहरी होती चली गई।
कफ सिरप मामला: पृष्ठभूमि और संदर्भ
कफ सिरप मामला उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश के कई हिस्सों में लंबे समय से चिंता का विषय रहा है—विशेषकर नशीले दुरुपयोग और अवैध आपूर्ति के संदर्भ में। इस मामले में अमिताभ ठाकुर का नाम सामने आना कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था। जांच एजेंसियों का दावा है कि मामला पूरी तरह कानून के दायरे में है, जबकि ठाकुर इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई करार देते हैं।
गिरफ्तारी और देवरिया जेल: घटनाओं का क्रम
गिरफ्तारी के बाद अमिताभ ठाकुर को देवरिया जिला कारागार भेजा गया। यहीं से उन्होंने सरकार और जांच एजेंसियों पर गंभीर आरोप लगाए—निष्पक्ष जांच न होने का दावा, साक्ष्यों की चयनात्मक व्याख्या और आलोचक को चुप कराने की कोशिश। देवरिया जेल से दिए गए उनके बयानों ने इस मामले को केवल आपराधिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और नैतिक बहस में बदल दिया।
राज्य बनाम नागरिक स्वतंत्रता: बड़ा सवाल
यह मामला केवल अमिताभ ठाकुर तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न को छूता है जहाँ राज्य की शक्ति और नागरिक स्वतंत्रता आमने-सामने खड़ी दिखती हैं। यदि एक पूर्व आईपीएस अधिकारी यह कहता है कि उसके साथ अन्याय हुआ, तो यह सवाल उठता है कि आम नागरिक के लिए न्याय की राह कितनी कठिन होगी।
निष्कर्ष नहीं, प्रश्न
यह रिपोर्ट किसी अंतिम निर्णय पर पहुँचने का दावा नहीं करती। लेकिन यह प्रश्न अवश्य छोड़ती है—क्या अमिताभ ठाकुर का सफ़र एक “भटके हुए अफ़सर” की कहानी है, या सत्ता से सवाल पूछने की कीमत चुकाने वाले व्यक्ति की? आईपीएस से जेल तक का यह सफ़र एक व्यक्ति की जीवनी नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भीतर चल रहे उस संघर्ष का दस्तावेज़ है, जहाँ सत्ता, कानून और असहमति एक-दूसरे से टकराते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अमिताभ ठाकुर कौन हैं?
वे उत्तर प्रदेश कैडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं, जो अपने विवादों और सत्ता-आलोचना के लिए जाने जाते हैं।
कफ सिरप मामला क्या है?
यह मामला नशीले कफ सिरप की अवैध आपूर्ति और उससे जुड़ी जांच से संबंधित है।
ठाकुर सरकार पर क्या आरोप लगा रहे हैं?
वे जांच एजेंसियों की निष्पक्षता और राजनीतिक प्रतिशोध का आरोप लगा रहे हैं।










