सीपत में विशाल हिन्दू सम्मेलन — सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण का संकल्प

सीपत के धान मंडी मंच पर आयोजित विशाल हिन्दू सम्मेलन में मंचासीन संत, वक्ता और बड़ी संख्या में उपस्थित मातृशक्ति व ग्रामीण जनसमूह

हरीश चन्द्र गुप्ता की रिपोर्ट
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सीपत। छत्तीसगढ़ के सीपत क्षेत्र में स्थित धान मंडी मंच रविवार को सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक आत्मबोध और राष्ट्र निर्माण से जुड़े विचारों का केंद्र बन गया, जब यहाँ विशाल हिन्दू सम्मेलन का भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ। सम्मेलन का मूल उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना, सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करना तथा राष्ट्रहित से जुड़े विषयों पर आम जनमानस को जागरूक करना रहा। “मनखे-मनखे एक समान” की भावना को केंद्र में रखते हुए आयोजित इस सम्मेलन में संत समाज, सामाजिक कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि, युवा वर्ग और मातृशक्ति की उल्लेखनीय सहभागिता देखने को मिली, जिससे पूरा परिसर विचार और आस्था के वातावरण से ओतप्रोत हो गया।

कार्यक्रम की शुरुआत भारत माता की प्रतिमा पर पुष्प माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुई। मंचासीन अतिथियों ने इसे केवल औपचारिक शुरुआत न मानते हुए इसे भारतीय संस्कृति, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक उत्तरदायित्व की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति बताया। दीप प्रज्वलन के साथ ही वातावरण “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम्” के नारों से गूंज उठा, जिसने उपस्थित जनसमूह में एक साझा भावनात्मक ऊर्जा का संचार किया।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि निखिल आश्रम बहतराई राष्ट्रीय संत समिति के अध्यक्ष स्वामी वासुदास जी महाराज ने कहा कि हिंदुत्व और सनातन धर्म की रक्षा करना किसी एक वर्ग या संगठन का नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतवासी का नैतिक और सामाजिक दायित्व है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आने वाला समय भारत के लिए स्वर्णिम सिद्ध होगा, क्योंकि देश का भविष्य युवा पीढ़ी के हाथों में है। ऐसे में यह आवश्यक है कि युवा वर्ग अपने धर्म, संस्कृति और राष्ट्र के प्रति सजग रहे तथा समाज को दिशा देने में अग्रणी भूमिका निभाए।

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स्वामी वासुदास जी महाराज ने गौ माता की रक्षा को लेकर विशेष रूप से जोर देते हुए कहा कि गौ माता केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक संरचना, कृषि व्यवस्था और सांस्कृतिक संतुलन का आधार रही हैं। उन्होंने कहा कि जिस समाज ने गौ माता का सम्मान किया, वही समाज करुणा, संयम और नैतिकता के मार्ग पर अग्रसर हुआ। उन्होंने उपस्थित जनसमूह से आह्वान किया कि धर्म, देश और समाज की रक्षा के लिए सबको संगठित होकर आगे आना होगा, क्योंकि संगठित समाज ही भविष्य की चुनौतियों का सामना कर सकता है।

मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े चन्द्रशेखर देवांगन ने अपने विचार रखते हुए कहा कि हिंदू समाज का संगठन केवल एक मंच पर एकत्र होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सतत सामाजिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य राष्ट्र निर्माण में सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने सौ वर्षों के सामाजिक कार्यकाल में हिंदू समाज को जोड़ने, संस्कारित करने और सेवा के माध्यम से राष्ट्रहित में कार्य करने का निरंतर प्रयास किया है।

चन्द्रशेखर देवांगन ने कहा कि भारत कभी शिक्षा, संस्कृति और ज्ञान के क्षेत्र में विश्व गुरु रहा है। हमने सदियों तक अपनी सभ्यता और संस्कृति को संरक्षित रखा, और इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब धर्म और सामाजिक मूल्यों की हानि हुई, तब-तब संत समाज और जागरूक नागरिकों ने आगे आकर समाज को दिशा दी। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद देश की वर्तमान स्थिति पर विचार करते हुए कहा कि भारत आज ज्ञान और विज्ञान दोनों क्षेत्रों में अग्रणी है, लेकिन इसके साथ-साथ कई सामाजिक और वैचारिक चुनौतियाँ भी हमारे सामने खड़ी हैं।

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उन्होंने समकालीन चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज को कट्टरवादी प्रवृत्तियों, विस्तारवादी भ्रम और वैचारिक भटकाव जैसी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए उन्होंने “पंच परिवर्तन” की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, नागरिक शिष्टाचार और ‘स्व’ का बोध शामिल है। उनका स्पष्ट संदेश था कि जो व्यक्ति भारत के लिए जिएगा और आवश्यकता पड़ने पर देश के लिए त्याग करेगा, वही सच्चे अर्थों में “भारत माता की जय” का उद्घोष कर सकता है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की अधिवक्ता पूर्णिमा सिंह ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि हिंदुत्व से ही हम अपने संस्कार, संस्कृति और जीवन मूल्यों को समझ पाते हैं। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म हमें यह सिखाता है कि जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें नैतिकता, करुणा और सामाजिक जिम्मेदारी का भी समावेश है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि आधुनिक जीवनशैली में हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होते जा रहे हैं और कई बार ऐसे मार्ग पर चल पड़ते हैं, जो हमारे जीवन के लिए अनुकूल नहीं होते।

पूर्णिमा सिंह ने मातृ शक्ति की भूमिका पर विशेष रूप से प्रकाश डालते हुए कहा कि हिंदू धर्म में मातृ शक्ति को सृजनकर्ता और पालनहार के रूप में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। जिस प्रकार हम अपनी राष्ट्रभूमि को माता के रूप में पूजते हैं, उसी प्रकार समाज में नारी शक्ति का सम्मान और संरक्षण आवश्यक है। उन्होंने कहा कि “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना तभी साकार हो सकती है, जब हम अपने व्यक्तिगत जीवन में भी संस्कार और संस्कृति को आत्मसात करें और समाज को केवल उपभोग की वस्तु न बनाएं।

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सम्मेलन में बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि, मातृशक्ति और युवा वर्ग उपस्थित रहा। इस अवसर पर स्वामी वासुदास जी महाराज, चन्द्रशेखर देवांगन, पूर्णिमा सिंह, मनीषा योगेश वंशकार (सरपंच सीपत), दीपक शर्मा (भाजपा मंडल अध्यक्ष), दिलेंद्र कौंशिल, राज्यवर्धन कौशिक, राजकुमार कौशिक, रामसनेही सूर्यवंशी, हरिकेश गुप्ता, हरीश गुप्ता, संजय गुप्ता सहित अनेक सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों और क्षेत्रीय नागरिकों की सक्रिय भागीदारी रही। कार्यक्रम का संचालन नीरज सिंह क्षत्री ने किया।

कुल मिलाकर सीपत में आयोजित यह विशाल हिन्दू सम्मेलन केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन भर नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्र निर्माण से जुड़े विचारों का सशक्त मंच बनकर उभरा। वक्ताओं के संबोधनों से यह स्पष्ट संदेश उभरकर सामने आया कि संगठित समाज, जागरूक नागरिक और संस्कारित युवा ही भारत के भविष्य को सशक्त और सुरक्षित बना सकते हैं।

क्लिक करें — सवाल और जवाब

सीपत में आयोजित हिन्दू सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य क्या था?

हिंदू समाज को संगठित करना, सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना और राष्ट्रहित से जुड़े विषयों पर जनजागरूकता फैलाना।

सम्मेलन में गौ रक्षा पर क्यों विशेष जोर दिया गया?

क्योंकि गौ माता भारतीय संस्कृति, कृषि व्यवस्था और सामाजिक संतुलन का महत्वपूर्ण आधार मानी जाती हैं।

पंच परिवर्तन से क्या आशय बताया गया?

सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, नागरिक शिष्टाचार और स्व का बोध।

सीपत अंचल में छेरछेरा लोकपर्व के दौरान बच्चों और महिलाओं द्वारा घर-घर अन्न संग्रह करते हुए पारंपरिक परंपरा निभाते दृश्य
छत्तीसगढ़ के सीपत अंचल में छेरछेरा लोकपर्व के अवसर पर बच्चों और महिलाओं ने पारंपरिक रूप से घर-घर जाकर अन्न संग्रह किया।

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