दिल्ली में शिक्षा व्यवस्था की असली स्थिति — कमियों की परतें, जिम्मेदारियों की पड़ताल और सुधार की राजनीति

कक्षा में बैठे छात्र और अध्यापिका के साथ ब्लैकबोर्ड पर लिखा “दिल्ली शिक्षा व्यवस्था” — स्कूल शिक्षा की वर्तमान स्थिति को दर्शाती फीचर इमेज
🖋 आशुतोष विद्यार्थी की रिपोर्ट

दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था एक लंबी राजनीतिक बहस का विषय रही है। आम आदमी पार्टी की सरकार आने के बाद इसे पूरे देश में एक मॉडल के रूप में पेश किया गया और विज्ञापनों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक, दिल्ली के सरकारी स्कूलों की चमक-दमक को सफलता की मिसाल मानने का दावा किया गया। लेकिन सवाल यह है कि चमकदार दीवारों और कुछ चुने हुए स्कूलों के दौरों के पीछे वास्तविक तस्वीर कितनी अलग थी? और उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि जिन कमियों पर विपक्ष, मीडिया और शिक्षा विशेषज्ञ लगातार टिप्पणी करते रहे — क्या वर्तमान भाजपा नेतृत्व वाली उपराज्यपाल व्यवस्था और केंद्र सरकार ने उन कमियों पर वास्तव में संज्ञान लिया? या फिर सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के दायरे में ही यह पूरी बहस सिमट कर रह गई?

दिल्ली के स्कूलों की हकीकत को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम कागज़ी उपलब्धियों और वास्तविक शिक्षा गुणवत्ता के बीच मौजूद खाई को विस्तार से देखें।

इमारतें चमकीं, लेकिन शिक्षा की जड़ें कमजोर रहीं

आम आदमी पार्टी सरकार ने स्कूलों में आधारभूत ढांचे के सुधार पर ध्यान दिया। कई जगहों पर नए कमरे बने, दीवारों पर पेंट दोबारा हुआ, स्मार्ट क्लास, बेंचें और एयर कंडीशनिंग की घोषणाएँ भी हुईं। यह बदलाव देखने लायक था, लेकिन इससे शिक्षा की बुनियाद — यानी सीखने-सिखाने की प्रक्रिया और शैक्षणिक परिणाम — उतने नहीं बदले जितना प्रचार में बताया गया।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विशेषज्ञों और कुछ स्वतंत्र अध्ययनों के अनुसार कई स्कूलों में छात्र सीखने के स्तर क्लास के मानक से काफी नीचे पाए गए। उदाहरण के लिए, आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों का बड़ा हिस्सा चौथी-पाँचवीं स्तर के गणित और भाषा के सवालों में संघर्ष करता रहा। यह स्थिति नई नहीं थी, और सुधार के बावजूद यह समस्या बड़े पैमाने पर बनी रही। इसे न तो पूरी तरह छुपाया जा सकता है और न ही नकारा जा सकता है।

शिक्षकों और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों को नियमित वेतन भुगतान — कड़वी सच्चाई

दिल्ली सरकार ने बार-बार कहा कि शिक्षकों को सर्वश्रेष्ठ सुविधाएँ दी जा रही हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि कई स्कूलों में गेस्ट टीचर्स, कॉन्ट्रैक्ट स्टाफ और सफाईकर्मियों को नियमित वेतन भुगतान में देरी होती रही। बात सिर्फ वेतन की नहीं थी, बल्कि अस्थायी नियुक्तियों का मनोवैज्ञानिक दबाव भी बहुत बड़ा मुद्दा बना रहा। एक बड़ा हिस्सा वर्षों से नियमितीकरण की प्रतीक्षा में था जबकि सरकार उन्हें चुनावी घोषणाओं में बार-बार आश्वासन देती रही।

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शिक्षकों की स्थायी नियुक्तियों में योग्यता, अनुभव और प्रशिक्षण की बजाय राजनीतिक और प्रशासनिक शर्तें अधिक प्रभावी रहीं। कई अध्यापकों ने माना कि लगातार कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने से व्यावसायिक स्थिरता और छात्रों के प्रति दीर्घकालिक जिम्मेदारी दोनों प्रभावित होती हैं। स्कूल प्रिंसिपलों से लेकर क्लर्क तक में नियुक्ति अनिश्चितता का दबाव शिक्षा की गुणवत्ता को तात्कालिक उपलब्धियों के बजाय दिखावे पर केंद्रित कर देता है।

मिड डे मील — कँटी हुई सच्चाई

मिड डे मील योजना के बारे में सरकार ने बार-बार दावा किया कि दिल्ली के सरकारी स्कूल इस योजना के मानकों पर देश में सबसे आगे हैं। लेकिन जमीनी जांचों ने कई सवाल खड़े किए।

खाना वितरण में कमी और पोषण स्तर की गिरावट को लेकर शिकायतें मीडिया में कई बार आईं। कोरोना काल के बाद स्कूलों के दोबारा खुलने पर, कई अभिभावकों ने बताया कि बच्चों को मिलने वाला भोजन मात्रा और गुणवत्ता दोनों में कमजोर पड़ा। कई स्थानों पर रसोई संचालकों को भुगतान समय से न मिलने से भी कार्य प्रभावित हुआ, जिसके चलते छात्रों को कभी-कभी भोजन में देर, फिर–फेर और विविधता की कमी झेलनी पड़ी।

मिड डे मील सिर्फ भोजन नहीं है; यह गरीब परिवारों के बच्चों के लिए स्कूल से जुड़ाव और पोषण का महत्वपूर्ण आधार है। इसमें गिरावट का असर सीधे उपस्थिति, स्वास्थ्य और छात्रों की एकाग्रता पर दिखाई दिया।

स्कूलों में सफाई और वातावरण — कुछ चमकदार स्कूल, पर अधिकांश साधारण

विज्ञापनों में दिखाए गए मॉडल स्कूलों और शहर के अधिकांश विद्यालयों के बीच अंतर आज भी मौजूद है। कुछ चुनिंदा स्कूल, जहाँ राजनैतिक प्रतिनिधि विदेशी यात्राओं के दौरान डेलीगेशन को ले जाते थे, पूरी तरह सुव्यवस्थित थे। लेकिन दिल्ली के बाहरी इलाकों, औद्योगिक क्षेत्रों और अनौपचारिक बस्तियों के पास स्थित सरकारी स्कूलों में सफाईकर्मियों की कमी और संसाधनों की सीमित उपलब्धता साफ दिखाई देती रही।

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सफाईकर्मियों का वेतन समय पर न मिलना, स्टाफ की संख्या न्यूनतम रखना और कचरा प्रबंधन की अधूरी व्यवस्था जैसी समस्याओं ने स्कूल वातावरण को प्रभावित किया। गंदगी और भीड़भाड़ बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर असर छोड़ती है, लेकिन यह पहलू प्रचार की रोशनी में लगभग अप्रभावित रहा।

शिक्षकों की उपस्थिति — कागज़ में संपूर्ण, कक्षाओं में अधूरी

दिल्ली में शिक्षकों की उपस्थिति को बेहतर बताने के लिए डिजिटल मार्किंग और निरीक्षण प्रणाली लागू की गई, लेकिन इसकी वास्तविकता भी जटिल रही। कई शिक्षकों को प्रशिक्षण, मीटिंग, कार्यक्रमों और प्रशासनिक कार्यों के नाम पर हफ्ते में कई दिन स्कूलों से बाहर रहना पड़ता था। इसका अंतिम दुष्परिणाम कक्षा में पढ़ाई पर पड़ता था।

छात्रों की नजरों से देखें तो — शिक्षक उपस्थित रहते हुए भी मानसिक रूप से पढ़ाई में उतना केंद्रित नहीं थे। शिक्षा लक्ष्य, सीखने के परिणाम और छात्रों की व्यक्तिगत जरूरतों पर ध्यान बहुत कम दिखाई दिया। कई अभिभावकों ने शिकायत की कि शिक्षक पढ़ाते कम और दस्तावेज़ भरने, रिपोर्टिंग और प्रेजेंटेशन अधिक करते हैं।

सरकारी व्यवस्था में कागज़ी प्रदर्शन को वास्तविक शिक्षण के मुकाबले अधिक महत्व मिल जाना आज की शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या बनता जा रहा है — और दिल्ली भी इससे अछूती नहीं रही।

नामांकन — संख्या का खेल, सीखने की गुणवत्ता पीछे

बड़ी संख्या में बच्चों के सरकारी स्कूलों में नामांकन के आँकड़े हमेशा प्रस्तुत किए गए — लेकिन नामांकन बढ़ना शिक्षा गुणवत्ता बढ़ने का संकेत नहीं होता। दिल्ली में निजी स्कूलों की फीस बढ़ने पर कई परिवार आर्थिक रूप से विवश होकर सरकारी स्कूलों में आए। यह सुधार नहीं, विकल्पहीनता की मजबूरी भी कहा जा सकता है।

स्कूलों की भीतरी प्रगति रिपोर्ट में विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता कई बार वास्तविक स्तर से ऊँची दिखाई गई, जिससे यह प्रचार संभव हो सका कि दिल्ली के स्कूल लगातार श्रेष्ठ परिणाम दे रहे हैं। लेकिन वास्तविकता में बोर्ड परिणाम गैर–सरकारी सहायता और विशेष तैयारी मॉडल्स के कारण बेहतर दिखे, जबकि कक्षा में सामान्य शिक्षा का स्तर वैसा नहीं था।

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अब सवाल — क्या वर्तमान भाजपा व्यवस्था ने कमियों को सच में नोटिस किया?

आम आदमी पार्टी के कार्यकाल पर गंभीर सवाल उठाने के बावजूद, यह भी सत्य है कि उप-राज्यपाल कार्यालय और केंद्र सरकार ने शिक्षा सुधार के विषय को प्राथमिकता नहीं दी, बल्कि विवाद राजनीतिक और प्रशासनिक खिंचतान तक सीमित रहा।

यदि स्थितियां इतनी खराब थीं, तो बड़े पैमाने पर सुधार की पहल क्यों नहीं हुई? यदि स्कूल मॉडल वाकई फेल था, तो बचाव हेतु वैकल्पिक शिक्षा योजना क्यों लागू नहीं की गई?

सच्चाई यह है कि शिक्षा पर सुधार की नीति की जगह राजनीतिक टकराव अधिक प्रभावी रहा 

एक ओर आम आदमी पार्टी ने स्कूलों को अपनी पहचान की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया, दूसरी ओर केंद्र और उप-राज्यपाल ने अधिकतर फैसलों को भ्रष्टाचार, ऑडिट और नियुक्तियों की अनियमितताओं के दायरे में रखकर मुद्दे को प्रचार–प्रधान बना दिया।

नतीजतन, दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था सुधार की बजाय राजनीतिक खींचतान की भेंट चढ़ी और सबसे बड़ा नुकसान छात्रों और शिक्षकों को हुआ।

शिक्षा की राजनीति ने शिक्षा को नुकसान पहुँचाया

दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था आज भी देश की कई राज्यों की तुलना में बेहतर कही जा सकती है, लेकिन इसे आदर्श मॉडल कहना वास्तविकता से दूर है।

चमकीली इमारतों के साथ-साथ यदि सीखने का स्तर, शिक्षकों की स्थिरता, मिड डे मील, सफाई, अनुशासन और शैक्षणिक ध्यान समान गति से बढ़ते, तो दिल्ली वाकई देश का सर्वोत्तम मॉडल बन सकती थी।

लेकिन हुआ उलटा — शिक्षा विज्ञापन, आरोप और तमाशे के बीच उलझ गई।

आज जरूरत इस बात की है कि सत्ता बदलने, दल बदलने और विचारधारा बदलने की राजनीति से हटकर शिक्षा सुधार की निरंतरता, अनुसंधान–आधारित नीति और छात्रों के भविष्य को केंद्र में रखकर निर्णय लिए जाएँ।

जब तक दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था राजनीतिक उपलब्धि का मंच बनी रहेगी, तब तक बच्चे उस प्रणाली के वास्तविक लाभार्थी नहीं बन पाएँगे, जिसका निर्माण मूल रूप से उन्हीं के भविष्य के लिए किया गया था।

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