
रंगीन मिज़ाज तो हम भी हो उठे हैं आज। कल तक जो शब्दों में आग सुलगाते थे, आज वही शब्द अबीर उड़ाते फिर रहे हैं। चल पड़े हैं हम बुंदेलखंड के पाठा की तरफ — जहाँ पहाड़ भी फाग गाते हैं, जहाँ पत्थर भी ढोल की थाप पर थिरकते हैं और जहाँ होली केवल खेली नहीं जाती, जी जाती है।
चित्रकूट के हमारे पुराने साथी संजय सिंह राणा के आँगन में आज सुबह से ही रंग की पंचायत बैठी है। दरवाज़े पर गुलाल की थाली सजी है, चबूतरे पर ढोलक रखी है और गली में गूँज रही है बुंदेलखंडी फाग की टेर। हवा में रंग है, धूप में अबीर है और लोगों के चेहरों पर वह बेफिक्र मुस्कान जो केवल फागुन में दिखाई देती है।
पाठा की सुबह और फाग की पहली टेर
सुबह होते ही गाँव की गलियों में ढोलक की थाप सुनाई देने लगी। चौपाल से लेकर खेत की मेड़ तक एक ही स्वर गूँज रहा था। बुज़ुर्गों ने फाग की शुरुआत की और युवाओं ने उसमें अपनी आवाज़ मिला दी।
“अरे हो रामा, फागुन आयो रे,
पाठा की धरती लजायो रे,
रंग डार द्यो भौजी पे आज,
भैया हँसि-हँसि मुसकायो रे।”
यह केवल गीत नहीं था, यह पाठा की आत्मा थी। जैसे ही स्वर उठा, लगा कि पहाड़ भी सुन रहे हैं और हवा भी ताल दे रही है।
अरावली की छाँव में रंगों की मस्ती
अरावली की श्रृंखलाओं से उतरती हवा में आज रंग की महक थी। दूर पहाड़ियों के बीच से आती धूप जब खेतों पर पड़ी तो लगा कि धरती स्वयं होली खेलने को तैयार है। कहीं बच्चे पिचकारी लिए दौड़ रहे थे, कहीं बुज़ुर्ग चौपाल पर बैठकर फाग की अगली कड़ी सोच रहे थे।
इसी बीच एक और टेर उठी —
“अरे चिरई-चिरगुन गावत फाग,
पहाड़न माँ गूँजे राग,
अबीर उड़ाय दे संजउ भैया,
आज न राखौं कउनौ लाग।”
और बस, यही वह क्षण था जब सचमुच लगा कि चिरकुट घाटी में फाग गूँज रही है और पाठा नाच उठा है।
भाभी, भैया और चाचा की होली
गाँव की पगडंडियों पर चलते हुए हर घर एक उत्सव की तरह दिखाई दे रहा था। कहीं भाभियाँ मुस्कुराकर अबीर लगा रही थीं, कहीं भैया रंग से भरी बाल्टी लेकर खड़े थे और चाचा जी पहले ही लाल-पीले हो चुके थे।
“अरे संपादक जी, बच के कहाँ जइहौ?” — किसी ने पीछे से आवाज़ लगाई। और फिर एक मुट्ठी गुलाल उड़ गई।
यह होली औपचारिक नहीं थी। यहाँ किसी का पद नहीं था, किसी की पहचान नहीं थी। यहाँ केवल रंग थे, हँसी थी और वह अपनापन था जो गाँव की मिट्टी में घुला होता है।
रंगों के बीच सवाल भी
रंग खेलते-खेलते कदम ज़िला मुख्यालय की ओर भी बढ़ गए। वहाँ जिलाधिकारी और अन्य अधिकारी भी आज हल्के मूड में दिखाई दिए। चेहरे पर हल्का गुलाल था और बातचीत में उत्सव की सहजता।
हमने पूछा — “महोदय, जिले के रंग कैसे हैं?”
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा — “रंग संतुलित रहें, यही कोशिश है।”
हमने रंग लगाया और साथ में एक सवाल भी छोड़ दिया — “रंग तो चढ़ जाते हैं साहब, पर क्या उम्मीदें भी चढ़ेंगी?”
अधिकारी भी मुस्कुराए। आज का दिन ऐसा था जब सवाल भी कठोर नहीं लगते थे, वे संवाद बन जाते थे।
लोकगीतों की गूँज और सामूहिक उल्लास
ढोलक की थाप तेज हो गई। गाँव के युवा और बुज़ुर्ग एक साथ फाग गाने लगे। स्वर में शरारत थी, पर उसमें अपनापन भी था।
“हो रामा, आज न रोको काहे,
रंग में भींज गयौ सारा गाहे,
चिरकुट घाटी गावत फाग,
पाठा नाचै लागे।”
इन पंक्तियों के साथ पूरा वातावरण जैसे झूम उठा। बच्चे हँस रहे थे, महिलाएँ चौखट से झाँक रही थीं और खेतों के पार तक रंग की धूल उड़ती दिखाई दे रही थी।
शाम की वापसी और स्मृतियों का रंग
धीरे-धीरे सूरज ढलने लगा। ढोलक की थाप भी धीमी पड़ गई और लोग अपने-अपने घरों की ओर लौटने लगे। रंग अब चेहरे पर सूख चुका था, पर मन में उसकी गर्माहट बाकी थी।
शाम को अपने आवास पर लौटकर जब आईने में देखा, तो लगा कि यह केवल रंग का दिन नहीं था। यह स्मृतियों का दिन था। आज खबर लिखी नहीं गई, आज खबर जी गई।
कहीं भाभी की हँसी थी, कहीं चाचा की ठिठोली, कहीं बच्चों की पिचकारी और कहीं प्रशासन से हुए छोटे-छोटे सवाल।
फागुन का संदेश
रात के सन्नाटे में भी कहीं दूर से फाग की आवाज़ सुनाई दे रही थी। हवा में अब भी गुलाल की हल्की महक थी। और मन में एक ही विचार था — होली केवल रंग का त्योहार नहीं है, यह संबंधों का उत्सव है।
आज चिरकुट घाटी में सचमुच फाग गूँजी थी और पाठा नाच उठा था।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
उत्तर: पाठा क्षेत्र में होली लोकगीतों, फाग, ढोलक और सामूहिक उत्सव के साथ मनाई जाती है जहाँ पूरा गाँव इसमें शामिल होता है।
उत्तर: फाग बुंदेलखंड और आसपास के क्षेत्रों का पारंपरिक लोकगीत है जो विशेष रूप से होली के अवसर पर गाया जाता है।
उत्तर: यह रिपोर्ट बताती है कि बुंदेलखंड के ग्रामीण इलाकों में होली केवल त्योहार नहीं बल्कि सामूहिक जीवन और लोक संस्कृति का उत्सव है।









