धर्म, विवाह और दंड : उत्तर प्रदेश के धर्मांतरण कानून के पीछे की असली तस्वीर

उत्तर प्रदेश धर्मांतरण कानून से जुड़ी प्रतीकात्मक तस्वीर, जिसमें धर्म, विवाह और न्याय व्यवस्था को दर्शाया गया है

सर्वेश द्विवेदी की खास रिपोर्ट
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यह दस्तावेज़ी रिपोर्ट कानून की पृष्ठभूमि, उसके प्रावधानों, संशोधनों, अब तक की कार्रवाई, सामाजिक-कानूनी प्रभाव और ज़मीनी हकीकत की पड़ताल करती है—बिना निर्णय थोपे, लेकिन प्रश्नों को खुला छोड़ते हुए।

उत्तर प्रदेश में साल 2021 में लागू हुआ उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021 राज्य के सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में एक निर्णायक मोड़ के रूप में सामने आया। इस कानून का घोषित उद्देश्य था—जबरन, धोखे से, प्रलोभन देकर या विवाह के माध्यम से कराए जाने वाले कथित गैरकानूनी धर्मांतरण को रोकना। लेकिन समय के साथ यह अधिनियम केवल एक विधायी प्रावधान भर नहीं रहा; यह प्रशासनिक कार्रवाई, पुलिसिंग, सामाजिक धारणाओं और संवैधानिक बहसों का केंद्र बनता चला गया। साल 2024 में इसमें की गई संशोधनों ने इस बहस को और तीखा कर दिया, जब अधिकतम सज़ा को बढ़ाकर उम्रकैद तक कर दिया गया।

कानून की पृष्ठभूमि: क्यों और कैसे

उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण को लेकर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श लंबे समय से मौजूद रहा है। 2010 के दशक के उत्तरार्ध में “लव जिहाद” जैसे शब्दों के प्रचलन, अंतरधार्मिक विवाहों पर बढ़ती निगरानी और कुछ हाई-प्रोफाइल मामलों के बाद राज्य सरकार ने 2020 में एक अध्यादेश के ज़रिये इस दिशा में कदम बढ़ाया। इसके बाद 2021 में विधानमंडल से पारित होकर यह अधिनियम कानून बना।

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सरकार का तर्क स्पष्ट था—किसी व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता तभी अर्थपूर्ण है जब उसका उपयोग बिना दबाव, भय या लालच के हो। राज्य के अनुसार, संगठित तरीके से धर्मांतरण के प्रयास सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करते हैं और महिलाओं, आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों तथा अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों को निशाना बनाते हैं।

प्रमुख प्रावधान : क्या कहता है कानून

2021 के अधिनियम में धर्मांतरण को “गैरकानूनी” तब माना गया जब वह बल, कपट, धोखा, प्रलोभन, अनुचित प्रभाव या विवाह के माध्यम से कराया गया हो। कानून में यह भी जोड़ा गया कि केवल धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किया गया विवाह शून्य माना जाएगा।

सज़ा के स्तर भी श्रेणीबद्ध किए गए—सामान्य मामलों में एक से पाँच साल तक की कैद और जुर्माना, जबकि नाबालिग, महिला या अनुसूचित जाति/जनजाति से जुड़े मामलों में सज़ा दो से दस साल तक बढ़ाई गई। इसके अलावा, धर्म परिवर्तन कराने वाले संगठनों पर भी आर्थिक दंड का प्रावधान रखा गया।

एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह भी था कि धर्म परिवर्तन से पहले जिला प्रशासन को सूचना देना अनिवार्य होगा। बिना सूचना के किया गया परिवर्तन स्वतः संदेह के दायरे में आ जाता है।

2024 का संशोधन : सख़्ती की नई सीमा

साल 2024 में सरकार ने इस अधिनियम में संशोधन कर अधिकतम सज़ा को उम्रकैद तक बढ़ा दिया। सरकार का कहना था कि संगठित अपराध की तरह चल रहे धर्मांतरण रैकेट्स पर प्रभावी रोक के लिए कठोरतम दंड आवश्यक है। संशोधन के बाद, यदि कोई मामला बड़े पैमाने पर, संगठित ढंग से या बार-बार अपराध की श्रेणी में आता है, तो अदालत उम्रकैद तक की सज़ा दे सकती है।

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यह बदलाव कानून को देश के सबसे कठोर धर्मांतरण विरोधी कानूनों में शामिल करता है। समर्थकों के अनुसार, इससे “डिटरेंस” यानी निवारक प्रभाव बढ़ेगा; आलोचकों के अनुसार, यह अनुपातहीन सज़ा का उदाहरण है।

ज़मीनी कार्रवाई : एफआईआर, गिरफ़्तारियाँ और मुकदमे

कानून लागू होने के बाद से राज्य में सैकड़ों मामलों में एफआईआर दर्ज की गईं। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, कई मामलों में अंतरधार्मिक विवाह, कथित प्रलोभन और सामूहिक धर्मांतरण के आरोप सामने आए। कुछ जिलों में विशेष पुलिस टीमें गठित की गईं और जांच एजेंसियों को वित्तीय लेन-देन तक खंगालने के निर्देश दिए गए।

हालाँकि, अदालतों में इन मामलों का परिणाम एकसमान नहीं रहा। कई मामलों में सबूतों के अभाव में आरोप कमज़ोर पड़े, जबकि कुछ में चार्जशीट दाख़िल हुई। ज़मीनी रिपोर्टिंग बताती है कि शुरुआती दौर में पुलिसिंग अधिक सक्रिय रही, लेकिन समय के साथ जांच की गुणवत्ता और कानूनी कसौटी पर टिके रहने की चुनौती बढ़ी।

अंतरधार्मिक विवाह और आपराधिक मामला — बरेली केस

2022 में बरेली जिले से सामने आए एक मामले में एक बालिग महिला ने अपने सहकर्मी से विवाह कर धर्म परिवर्तन किया। महिला के परिजनों की शिकायत पर युवक के खिलाफ धर्मांतरण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज हुई।

पुलिस ने विवाह से पहले धर्म परिवर्तन को संदेहास्पद माना गया। यह तर्क दिया गया कि महिला को “भावनात्मक दबाव” में बदला गया धर्म।

अदालती स्थिति यह रही कि, महिला ने मजिस्ट्रेट के सामने बयान में कहा कि उसने अपनी मर्ज़ी से धर्म अपनाया। फिर ठोस सबूतों के अभाव में अदालत ने आरोपी को राहत दी।

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यह मामला दिखाता है कि कानून का उपयोग अक्सर परिवार की असहमति को कानूनी कार्रवाई में बदलने के माध्यम के रूप में भी हुआ। यहाँ सवाल उठा—क्या हर अंतरधार्मिक विवाह अपने आप में संदेह का आधार बन सकता है?

आगे की राह : प्रभाव और अनुत्तरित प्रश्न

2021 से 2024 तक, उत्तर प्रदेश का धर्मांतरण विरोधी कानून एक साधारण विधायी पहल से आगे बढ़कर सामाजिक-कानूनी प्रयोग बन चुका है। सख़्ती बढ़ी है, दंड कड़े हुए हैं, लेकिन साथ ही यह सवाल भी खड़े हुए हैं कि क्या कठोरता अपने आप में समाधान है।

आने वाले समय में अदालतों के फैसले, ज़मीनी आंकड़े और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ तय करेंगी कि यह कानून किस दिशा में जाता है—निवारक प्रभाव की मिसाल बनता है या संवैधानिक संतुलन की नई परीक्षा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या उत्तर प्रदेश में धर्म परिवर्तन पूरी तरह प्रतिबंधित है?

नहीं, लेकिन जबरन, लालच या धोखे से कराया गया धर्म परिवर्तन अपराध की श्रेणी में आता है।

क्या केवल अंतरधार्मिक विवाह पर केस हो सकता है?

केवल विवाह नहीं, लेकिन यदि धर्म परिवर्तन को अवैध तरीके से जोड़ा जाए तो मामला बन सकता है।

2024 के संशोधन में सबसे बड़ा बदलाव क्या है?

अधिकतम सज़ा को बढ़ाकर उम्रकैद किया जाना सबसे बड़ा बदलाव है।

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