समाचार नहीं, साक्ष्य है ‘पाठा की आवाज़’ — हाशिए से उठती एक ज़मीनी दस्तावेज़ी किताब

लाल पृष्ठभूमि पर प्रकाशित पुस्तक ‘समाचार दर्पण: पाठा की आवाज़’ का कवर, जिसमें ग्रामीण जीवन, शिक्षा, पुलिस कार्रवाई और पत्रकारिता से जुड़े दृश्य दर्शाए गए हैं।

पुस्तक समीक्षा

समाचार दर्पण : पाठा की आवाज़

लेख / शोध :
संजय सिंह राणा

संपादन :
अनिल अनूप

प्रकाशक :
शायरेन पब्लिकेशन, पलवल (हरियाणा)

‘समाचार दर्पण : पाठा की आवाज़’ किसी पारंपरिक अर्थ में इतिहास की पुस्तक नहीं है, न ही इसे शोध-ग्रंथ की श्रेणी में रखा जा सकता है। यह एक ऐसा क्षेत्रीय सामाजिक दस्तावेज़ है, जो बुंदेलखंड के पाठा क्षेत्र—विशेषकर चित्रकूट—की सांस्कृतिक स्मृति, सामाजिक यथार्थ और प्रशासनिक उपेक्षा को एक संवेदनशील लेकिन स्पष्ट दृष्टि के साथ सामने लाने का प्रयास करता है। यह पुस्तक योजनाओं की भाषा में नहीं, बल्कि जीवन की भाषा में बात करती है। लेखक स्वयं इस तथ्य को स्वीकार करता है कि यह कोई सरकारी रिपोर्ट या संस्थागत अध्ययन नहीं, बल्कि एक सामाजिक कार्यकर्ता–पत्रकार की ज़मीनी चेतना से उपजा लेखन है। यही स्वीकारोक्ति इस पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति भी है और उसकी सीमा भी।

इस पुस्तक का मूल उद्देश्य किसी निष्कर्ष तक पहुँचना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को दर्ज करना है, जिन्हें अक्सर नीति, सत्ता और विकास की शब्दावली में अनदेखा कर दिया जाता है। पाठा क्षेत्र का जीवन यहाँ किसी आँकड़े या सूचकांक के रूप में नहीं, बल्कि अनुभव, स्मृति और संघर्ष के रूप में उपस्थित होता है। लेखक का आग्रह स्पष्ट है—ग्रामीण भारत को “योजना” की वस्तु नहीं, बल्कि “जीवन” की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।

लेखकीय दृष्टि की बात करें तो संजय सिंह राणा का लेखन निष्पक्ष पर्यवेक्षक की दूरी से नहीं, बल्कि संलग्न सहभागी की निकटता से विकसित होता है। वे जिस भूगोल और समाज के बारे में लिखते हैं, उसी के बीच से आते हैं। यह सहभागिता उनके लेखन को एक अतिरिक्त नैतिक बल देती है। ग्रामीण जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य, विस्थापन और अधिकारों से जुड़े प्रश्न यहाँ काग़ज़ी नहीं लगते, बल्कि अनुभवजन्य प्रतीत होते हैं। “चलो गाँव की ओर” जैसे विचार इस पुस्तक में नारा बनकर नहीं, बल्कि व्यावहारिक आग्रह बनकर आते हैं। यह आग्रह शहरी मध्यवर्गीय विमर्श को असहज भी करता है और चुनौती भी देता है।

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हालाँकि, यही संलग्नता कई बार लेखन को भावनात्मक आवेग की ओर भी ले जाती है। प्रशासनिक विफलताओं की आलोचना तीव्र है, लेकिन अनेक स्थलों पर आँकड़ों और ठोस डेटा का अभाव महसूस होता है। विरोध का स्वर स्पष्ट है, पर वैकल्पिक नीतिगत ढाँचों पर चर्चा सीमित रह जाती है। यह आलोचना इसलिए आवश्यक है क्योंकि पुस्तक स्वयं को सामाजिक दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत करती है, न कि केवल भावनात्मक बयान के रूप में। फिर भी यह भी स्वीकार करना होगा कि लेखक का उद्देश्य शोधात्मक निष्कर्ष देना नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना को झकझोरना है—और इस लक्ष्य में वह काफी हद तक सफल होता है।

भाषा और शिल्प की दृष्टि से यह पुस्तक अखबारी शैली से निकली हुई, सरल और संवादात्मक भाषा का उपयोग करती है। संस्कृतनिष्ठता या दुरूह शब्दावली से परहेज़ इस पुस्तक को सामान्य पाठक के लिए सुलभ बनाता है। लोक-स्मृति, रामायण, तुलसी और चित्रकूट की धार्मिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का प्रयोग यहाँ सजावटी नहीं, बल्कि सन्दर्भगत है। अध्याय–1 में “जहाँ राम ने तिलक लगाया था…” जैसे शीर्षक भावनात्मक प्रभाव पैदा करते हैं और पाठक को भूगोल से जोड़ते हैं। हालाँकि, कहीं-कहीं पुनरुक्ति और अनुच्छेद संरचना में संपादकीय कसावट की गुंजाइश दिखाई देती है। कुछ कथन साक्ष्य से अधिक विश्वास पर टिके हुए प्रतीत होते हैं, जिससे आलोचनात्मक पाठक को ठहरकर सोचने की आवश्यकता पड़ती है।

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निष्पक्षता के प्रश्न पर यह पुस्तक एक जटिल स्थिति में खड़ी दिखाई देती है। यह कहना उचित होगा कि ‘पाठा की आवाज़’ किसी राजनीतिक दल का प्रचार साहित्य नहीं है, पर यह राजनीति से निरपेक्ष भी नहीं है। लेखक सत्ता, व्यवस्था और उपेक्षा पर लगातार प्रश्न उठाता है, लेकिन किसी एक दल या विचारधारा का मुखपत्र नहीं बनता। आलोचना का पलड़ा स्पष्ट रूप से व्यवस्था के विरुद्ध झुका हुआ है, जो एक सामाजिक दस्तावेज़ के लिए स्वाभाविक है। किंतु अकादमिक तटस्थता के कठोर मानकों पर इसे आंशिक पक्षधरता कहा जा सकता है। यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि सामाजिक लेखन में पूर्ण निरपेक्षता अक्सर एक भ्रम होती है।

संरचनात्मक दृष्टि से पुस्तक विषय-सूची के अनुसार क्रमिक विकास में आगे बढ़ती है—धार्मिक-सांस्कृतिक स्मृति से सामाजिक यथार्थ, फिर आदिवासी-दलित जीवन और अंततः आधुनिक बदलाव की ओर। यह क्रम तार्किक है और पाठक को एक यात्रा का अनुभव देता है। फिर भी अध्यायों के बीच संक्रमण और अधिक सुदृढ़ हो सकता था। कुछ अध्यायों में रिपोर्टिंग, संस्मरण और वैचारिक टिप्पणी एक साथ घुल जाते हैं, जिससे शैली की एकरूपता प्रभावित होती है। यह दोष नहीं, बल्कि उस शैली का परिणाम है, जिसमें लेखक स्वयं को विषय से अलग नहीं करता।

यह पुस्तक विशेष रूप से उन पाठकों के लिए उपयोगी है, जो ग्रामीण भारत को केवल योजनाओं और रिपोर्टों के माध्यम से नहीं समझना चाहते। क्षेत्रीय पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुंदेलखंड–चित्रकूट पर काम करने वाले शोधार्थियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ हो सकती है—अंतिम सत्य के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत दस्तावेज़ के रूप में। मीडिया और समाज के संबंधों को समझने वाले विद्यार्थियों के लिए भी यह पुस्तक एक केस-स्टडी की तरह उपयोगी हो सकती है।

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समग्र रूप से ‘समाचार दर्पण : पाठा की आवाज़’ एक ईमानदार, ज़मीनी और संवेदनशील प्रयास है। यह पुस्तक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करती है, लेकिन स्वयं को सर्वज्ञ घोषित नहीं करती। इसकी सबसे बड़ी शक्ति इसकी नियत है, और इसकी सबसे बड़ी सीमा इसकी शोधीय कसावट का अभाव। यह समाधान नहीं देती, लेकिन सही सवाल उठाती है। यह बेचैनी पैदा करती है, पाठक को असहज करती है, और सोचने के लिए मजबूर करती है—और यही किसी भी सामाजिक पुस्तक की सबसे बड़ी सफलता मानी जानी चाहिए।

पाठकों के प्रश्न

‘समाचार दर्पण : पाठा की आवाज़’ किस तरह की पुस्तक है?

यह पुस्तक न तो पारंपरिक इतिहास है और न ही अकादमिक शोध-ग्रंथ। यह बुंदेलखंड के पाठा क्षेत्र की सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक वास्तविकताओं पर आधारित एक ज़मीनी सामाजिक दस्तावेज़ है।

क्या यह पुस्तक राजनीतिक प्रचार के दायरे में आती है?

नहीं। पुस्तक सत्ता और व्यवस्था की आलोचना करती है, लेकिन किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा का प्रचार नहीं करती। यह सामाजिक प्रश्नों पर केंद्रित लेखन है।

यह पुस्तक किन पाठकों के लिए अधिक उपयोगी है?

यह पुस्तक क्षेत्रीय पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शोधार्थियों और उन पाठकों के लिए उपयोगी है जो ग्रामीण भारत को योजनाओं से नहीं, जीवन के रूप में समझना चाहते हैं।

बुंदेलखंड के चित्रकूट जिले में कोल आदिवासी समुदाय की ज़िंदगी, जहां शराब की लत, गरीबी और ज़मीन हड़पने की समस्या ने सामाजिक संकट पैदा किया है
चित्रकूट के जंगलों और पहाड़ियों के बीच कोल आदिवासियों का जीवन—जहां शराब, गरीबी और ज़मीन छिनने का दर्द रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुका है।

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