
फागुन का महीना जब दस्तक देता है, तो संपादक भी मन से थोड़ा कवि हो जाता है। शब्दों की सख्ती ढीली पड़ती है और भीतर कहीं छुपा “गुस्ताख दिल” बाहर आ जाता है। इस बार तय हुआ कि होली सिर्फ दफ्तर में नहीं खेलेगे — उसे रास्तों पर, शहरों में, अपने लोगों के बीच खोजेंगे। यह यात्रा रंग की थी, पर उससे अधिक संबंधों की थी।
लुधियाना : दिलदार शुरुआत
यात्रा की शुरुआत लुधियाना से हुई। दरवाज़ा खुलते ही पंजाबी आत्मीयता सामने थी— “ओ पाजी, की हाल है? अज्ज तुसी बचोगे नहीं… होली है जी!” विकास गुप्ता ने पहले औपचारिक मुस्कान दी, फिर रंग का पहला छींटा पड़ते ही बोले— “पहले चा पियो जी, फेर रंग लगाइए।” पंजाब में रंग भी खुलकर लगता है और अपनापन भी। यहाँ होली सिर्फ त्योहार नहीं, मेहमाननवाज़ी का विस्तार है। गुस्ताख दिल ने महसूस किया—उत्सव का पहला रंग दिल पर चढ़ता है, चेहरे पर बाद में।
सीतापुर : देसीपन की सोंधी आंच
जैसे ही काफिला पूर्वांचल में पहुँचा, भाषा की मिट्टी बदल गई। सीतापुर में रितेश गुप्ता स्वागत के स्वर कुछ यूँ थे— “का हो, एतना सुथरा कपड़ा पहिरले बानी? फगुआ में बच के जइब?” सुनील शुक्ला जी फाग गुनगुनाते हुए आए— “फगुआ में उड़े रे गुलाल…” यहाँ बोली में सोंधापन है। अबीर कम था, अपनापन ज़्यादा। विवेक शुक्ला और सर्वेश शुक्ला ने औपचारिकता को दो मिनट भी जीवित नहीं रहने दिया। रंग लगा, हँसी छूटी, और संपादकीय गंभीरता ने वहीं विश्राम ले लिया। सीतापुर की बूंदी और देसी गुलाल ने यात्रा को पहला स्थायी रंग दिया।
हरदोई : गुझिया के साथ संवाद
हरदोई में अनुराग गुप्ता ने रंग से पहले गुझिया परोसी। हल्की मुस्कान के साथ बोले— “पहिले मुँह मीठा कर लीं, फेर रंग लगाईं।” यह वाक्य जितना सरल था, उतना ही अर्थपूर्ण। यहाँ संवाद मिठास से शुरू होता है। गुझिया के साथ बैठी बातचीत में खबरों से अधिक हालचाल था। यह याद दिलाता है कि पत्रकार भी आखिरकार समाज का ही हिस्सा है।
लखनऊ बंथरा : तहज़ीब और तासीर
लखनऊ पहुँचना मतलब भाषा का लहजा बदल जाना। कमलेश चौधरी की हवेली में प्रवेश करते ही सुनाई पड़ा— “जनाब, तशरीफ़ लाइए… इंतज़ाम मुकम्मल है।” सर्वेश यादव ने मुस्कुराते हुए जोड़ा— “भाई, पहले ढोल बजाओ, फिर गिलास उठाओ।” यहाँ अबीर भी तहज़ीब से लगता है। भांग का घूँट भी शालीनता के साथ। लखनऊ की हवा में नज़ाकत है, पर मस्ती भी कम नहीं। गुस्ताख दिल ने दर्ज किया—संयम और शरारत का संतुलन शायद इसी शहर ने गढ़ा है।
बांदा : ठेठपन की मिठास
बांदा में धर्मेन्द्र और संतोष सोनी ने स्वागत कुछ यूँ किया— “मालपुआ खाए बिना आगे बढ़ना मना है, भैया।” बुंदेलखंड की भाषा में ठेठपन है, पर दिल वैसा ही साफ। मालपुए की मिठास और रंग की उछाल ने वातावरण को और खुला बना दिया। यहाँ उत्सव में दिखावा नहीं, सहजता है। रंग उड़ता है तो मन भी खुलता है।
पाठा : पहाड़ और फाग
बुंदेलखंड के पाठा में संजय सिंह राणा इंतज़ार में थे। हल्की मुस्कान के साथ बोले— “अबकी फागुन पहाड़न पे भी रंग डार दियो।” यहाँ हवा में ठंडक थी, पर स्वागत में गर्मजोशी। फाग की आवाज़ पहाड़ी ढलानों से टकराकर लौटती रही। गुस्ताख दिल ने महसूस किया—उत्सव का असली अर्थ भौगोलिक सीमाएँ नहीं जानता।
प्रयागराज : संगम का रंग
प्रयागराज पहुँची गुस्ताख दिल की टोली तो संगम की हवा में ही रंग घुला मिला था। अंजनी त्रिपाठी जी ने दूर से ही आवाज़ लगाई— “का संपादक जी, एतना घूम लिहनी, अब संगम बिना रंग चढ़े लौट जइब?” बस फिर क्या था, गंगा-जमुनी मिजाज़ के शहर में अबीर भी अदब से लगा और हँसी भी ठेठ अंदाज़ में फूटी। किसी ने कान में कहा— “देखीं, यहाँ रंग धीरे-धीरे चढ़ता है, पर उतरता नहीं।” अंजनी जी ने फाग की दो पंक्तियाँ छेड़ीं, और संगम किनारे की हवा में पत्रकारिता भी लोकगीत बन गई। उस क्षण लगा कि प्रयागराज में होली सिर्फ खेली नहीं जाती, महसूस की जाती है — और गुस्ताख दिल की रंगयात्रा वहीं जाकर पूरी हुई। 🎨
गोंडा और बलरामपुर: सहज अपनापन
गोंडा में प्रधान चुन्नीलाल पहले से तैयार— “ए भाई, अबीर के ढेर लगल बा, जल्दी आवा!” यहाँ बोली में सीधापन है। रंग लगा तो सब बराबर। बलरामपुर में नौशाद अली न मिले। हल्की हँसी के साथ टिप्पणी हुई— “लगता है बच के निकल गइनी!” दुलहापुर बनकट में दुर्गा प्रसाद शुक्ला मिले। भांग का एक दौर और हँसी का दूसरा। चेहरे रंग से ढक गए, पहचान अनावश्यक हो गई।
जौनपुर से ब्रज: रंग का उत्कर्ष
राम कीर्ति यादव और विवेक पाठक को साथ लेकर टोली मथुरा पहुँची। के के सिंह के साथ ब्रज शैली में होली। “होरी खेले रघुवीरा अवध में…” यहाँ रंग परंपरा था। यहाँ अबीर संस्कृति था। ब्रज में होली खेलते समय समझ आया — रंग सिर्फ त्वचा पर नहीं चढ़ता, वह स्मृति में बस जाता है।
मथुरा: ब्रज का रस
मथुरा पहुँचना मतलब रंग का आध्यात्मिक रूप। स्वर बदला— “आओ भैया, आजु बिरज में होरी है।” ब्रज की भाषा में रंग नहीं, रस है। के के सिंह के साथ फाग— “होरी खेलें नंदलाल बिरज में…” ब्रजवासी माया शंकर साहू और हिमांशु मोदी जी भी मिल कर हिल गए। यहाँ होली खेलना एक परंपरा में प्रवेश करना है। रंग सिर्फ त्वचा पर नहीं, स्मृति में बसता है।
देवरिया: शराफत से शरारत तक
देवरिया में मोहन द्विवेदी ने पहले टीम की हालत देख गंभीरता ओढ़ी। फिर मुस्कराकर बोले— “अरे भाई, होली है… छोड़ो भी!” संजय वर्मा थिरके, अर्जुन वर्मा संभले। इतने में सर्वेश द्विवेदी भी आए महकदार देसी गुलाल और देवरिया की मिठाई खिलाते रंगीन मौसम में चार चांद लगा दी। इरफान अली लारी रोजेदार थे, पर मुस्कान रंगीन— “हम बेरंग सही, मौसम रंगीन है।” यही इस यात्रा का सार था।
संपादकीय टिप्पणी: रंग क्यों ज़रूरी है?
पत्रकारिता हमें अक्सर कठोर बना देती है। तथ्यों की भाषा में भावनाएँ छूट जाती हैं। पर समाज को समझने के लिए सिर्फ रिपोर्टिंग नहीं, संबंध भी चाहिए। इस यात्रा ने बताया— भाषाएँ अलग हैं, पर भाव एक। पंजाब का “ओ पाजी”, पूर्वांचल का “का हो”, लखनऊ का “जनाब”, ब्रज का “आओ भैया” — ये सब मिलकर भारत बनाते हैं। और गुस्ताख दिल की हिंदी — इन सबको जोड़ने वाली डोरी है। लुधियाना से ब्रज तक यह रंगयात्रा सिर्फ होली नहीं थी। यह प्रमाण थी कि समाचार दर्पण खबरों का मंच भर नहीं, रिश्तों का वृत्त है। रंग उतर जाते हैं, पर जो अपनापन चढ़ता है — वह साल भर बना रहता है। और शायद यही होली का असली अर्थ है।
(आलेख अनिल अनूप और प्रस्तुति इरफान अली लारी)
FAQ
यह रंगयात्रा किन-किन शहरों तक पहुँची?
लुधियाना, सीतापुर, हरदोई, लखनऊ, बांदा, पाठा, प्रयागराज, गोंडा, बलरामपुर, जौनपुर, मथुरा और देवरिया तक।
इस लेख का मूल भाव क्या है?
पत्रकारिता और संबंधों के बीच संतुलन तथा होली के रंगों में टीम की सामूहिक स्मृति।










