आवासीय क्षेत्र में जेसीबी कार्रवाई का मामला उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ शहर से सटे बेलईसा इलाके में उस समय तूल पकड़ गया, जब सेतु निगम की ओर से बनाए जा रहे नए रेलवे ओवर ब्रिज के नाम पर बिना किसी पूर्व सूचना के आबादी वाले मकानों पर जेसीबी चला दी गई। अचानक हुई इस कार्रवाई से इलाके में हड़कंप मच गया और मकान मालिकों ने मौके पर पहुंचकर विरोध शुरू कर दिया। हालात बिगड़ते देख सेतु निगम की टीम को जेसीबी लेकर वापस लौटना पड़ा।
बेलईसा ओवर ब्रिज के पास नया निर्माण बना विवाद की जड़
आजमगढ़ शहर से सटे बेलईसा रेलवे ओवर ब्रिज के बगल में सेतु निगम द्वारा एक नया ओवर ब्रिज निर्मित किया जा रहा है। प्रशासनिक स्तर पर इसे यातायात सुविधा बढ़ाने की योजना बताया जा रहा है, लेकिन स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इस निर्माण प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की जा रही है। आरोप है कि पहले से मौजूद पुल के पास स्थित पुराने आवासीय मकानों को बिना नोटिस दिए हटाने की कोशिश की गई।
बिना नोटिस शुरू हुई जेसीबी कार्रवाई, लोग रह गए सन्न
स्थानीय लोगों के अनुसार, जब सेतु निगम की टीम जेसीबी मशीन लेकर पहुंची, तब किसी को अंदाजा भी नहीं था कि आवासीय मकानों को निशाना बनाया जाएगा। ना तो किसी प्रकार का लिखित नोटिस दिया गया था और ना ही मौखिक सूचना। अचानक जेसीबी चलने से लोग सन्न रह गए। कई परिवार उस समय घरों के अंदर नहीं थे, जिससे नुकसान और ज्यादा हो गया।
डेढ़ सौ साल पुराने मकान को नुकसान, पीड़ित की आपबीती
पीड़ित रामविलास साहू ने बताया कि उनका मकान करीब डेढ़ सौ साल पुराना है और आबादी की जमीन पर स्थित है। उन्होंने कहा कि पुल निर्माण से उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन कानूनन प्रक्रिया अपनाए बिना इस तरह की कार्रवाई पूरी तरह गलत है। रामविलास साहू के अनुसार, बिना नोटिस जेसीबी चलाकर उनके मकान को भारी नुकसान पहुंचाया गया।
ना प्रशासन मौजूद, ना पुलिस—बढ़ा आक्रोश
स्थानीय लोगों का आरोप है कि पूरी कार्रवाई के दौरान न तो जिला प्रशासन का कोई अधिकारी मौजूद था और न ही पुलिस बल। यह स्थिति और भी गंभीर इसलिए हो गई क्योंकि जब लोगों ने विरोध किया तो सेतु निगम के अधिकारी जेसीबी लेकर मौके से चले गए। लोगों का कहना है कि अगर कार्रवाई वैध होती, तो प्रशासन और पुलिस की मौजूदगी अनिवार्य होती।
मुआवजे की मांग, निर्माण से नहीं विरोध
भागवत प्रसाद तिवारी सहित अन्य प्रभावित लोगों ने साफ कहा कि उन्हें पुल निर्माण से कोई आपत्ति नहीं है। उनकी केवल यही मांग है कि पहले जमीन का उचित मूल्यांकन किया जाए, मुआवजा तय किया जाए और उसके बाद ही मकानों को हटाया जाए। बिना मुआवजे और नोटिस के की गई कार्रवाई को वे अन्याय बता रहे हैं।
कानूनी प्रक्रिया पर उठे सवाल
जानकारों के अनुसार, किसी भी सरकारी निर्माण परियोजना में प्रभावित पक्ष को पहले नोटिस देना, सुनवाई का अवसर देना और मुआवजा तय करना अनिवार्य होता है। इस मामले में इन सभी प्रक्रियाओं को दरकिनार किए जाने का आरोप है। यही वजह है कि यह मामला अब सिर्फ स्थानीय विवाद नहीं रह गया, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल बन गया है।
स्थानीय लोगों में डर और असुरक्षा का माहौल
इस घटना के बाद इलाके के अन्य निवासी भी सहमे हुए हैं। लोगों का कहना है कि अगर आज एक मकान पर बिना नोटिस जेसीबी चल सकती है, तो कल किसी और के घर की बारी आ सकती है। इससे आम नागरिकों में असुरक्षा की भावना गहराती जा रही है।
प्रशासन से कार्रवाई की मांग
स्थानीय लोगों और पीड़ित परिवारों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की जांच कराई जाए और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई हो। साथ ही, जो नुकसान हुआ है उसका उचित मुआवजा दिया जाए, ताकि लोगों का भरोसा व्यवस्था पर बना रह सके।
आवासीय क्षेत्र में जेसीबी कार्रवाई का यह मामला आजमगढ़ में प्रशासनिक संवेदनशीलता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। विकास आवश्यक है, लेकिन वह कानून और नागरिक अधिकारों की कीमत पर नहीं हो सकता। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में क्या रुख अपनाता है और प्रभावित लोगों को न्याय कब तक मिलता है।







