मतदाता पुनरीक्षण अभियान का उद्देश्य लोकतंत्र को मजबूत करना और हर पात्र नागरिक को उसका मताधिकार सुनिश्चित करना होता है, लेकिन जब यही प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ जाए, तो भरोसे की बुनियाद हिलने लगती है। ताजा मामला मतदाता पुनरीक्षण अभियान के दौरान सामने आई एक ऐसी गड़बड़ी का है, जिसने न सिर्फ एक परिवार को बल्कि पूरे मोहल्ले को असमंजस में डाल दिया है। एक मकान में ऐसे लोगों के नाम दर्ज कर दिए गए, जिनका उस घर से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है, और वह भी मकान के कथित बंटवारे को कागजों में दिखाकर।
मतदाता पुनरीक्षण अभियान के बाद एक ही मकान में अलग-अलग समुदायों के कई फर्जी मतदाता नाम जुड़ गए, मकान का बंटवारा दिखाकर नंबर बदल दिया गया और असली मालिक को इसकी भनक तक नहीं लगी—अब प्रशासनिक जांच शुरू हो चुकी है।
एक मकान, कई नाम और चौंकाने वाली एंट्री
मतदाता पुनरीक्षण अभियान से पहले संबंधित मकान में केवल परिवार के सदस्यों के नाम दर्ज थे। सूची में कुल पांच मतदाता शामिल थे, जो वर्षों से उसी पते पर निवास कर रहे थे। लेकिन जैसे ही पुनरीक्षण अभियान पूरा हुआ, मकान की मतदाता सूची में अचानक सात नए नाम जुड़ गए। हैरानी की बात यह है कि इन नए नामों का न तो उस परिवार से कोई रिश्ता है और न ही उस मकान से कोई वास्तविक जुड़ाव।
कागजों में दिखाया गया मकान का बंटवारा
मामला यहीं तक सीमित नहीं रहा। मतदाता पुनरीक्षण अभियान के बाद दस्तावेज़ों में यह भी दर्शा दिया गया कि मकान का बंटवारा हो चुका है। मकान संख्या, जो पहले एक ही थी, उसे बदलकर नया उप-नंबर दे दिया गया। जबकि वास्तविकता यह है कि न तो मकान का कोई बंटवारा हुआ और न ही ऐसा कोई आवेदन मकान मालिक द्वारा कभी दिया गया।
मकान मालिक को कैसे हुई जानकारी
जब मकान मालिक ने नियमित रूप से मतदाता सूची का अवलोकन किया, तब यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। सूची में नए नाम देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस घर में वे वर्षों से रह रहे हैं, उसी पते पर अनजान लोगों का मतदाता के रूप में दर्ज होना न सिर्फ हैरानी भरा था, बल्कि भविष्य में गंभीर कानूनी और सामाजिक समस्याओं का संकेत भी था।
प्रशासन से की गई शिकायत
मामले की गंभीरता को समझते हुए मकान मालिक ने तत्काल जिला प्रशासन से शिकायत की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका मकान न तो विभाजित हुआ है और न ही किसी अन्य व्यक्ति को उसमें निवास की अनुमति दी गई है। शिकायत में यह भी आशंका जताई गई कि यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले चुनावों में इसका दुरुपयोग हो सकता है।
जांच के आदेश और जिम्मेदारी तय
शिकायत सामने आने के बाद प्रभारी जिला अधिकारी ने मामले को गंभीरता से लिया और जांच का जिम्मा उपजिलाधिकारी को सौंप दिया। प्रशासन की ओर से यह आश्वासन दिया गया कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की जाएगी और यदि मतदाता पुनरीक्षण अभियान में किसी स्तर पर लापरवाही या जानबूझकर की गई गड़बड़ी पाई गई, तो संबंधित कर्मचारियों पर कार्रवाई होगी।
सतर्कता के दावों पर उठे सवाल
हैरानी की बात यह है कि जिला स्तर पर मतदाता पुनरीक्षण अभियान को लेकर लगातार यह दावा किया गया था कि प्रक्रिया पूरी सतर्कता और निगरानी के साथ संपन्न कराई गई है। जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा स्वयं मॉनिटरिंग किए जाने की बात कही गई थी। इसके बावजूद इस तरह की गड़बड़ी सामने आना, न सिर्फ प्रशासनिक दावों पर सवाल खड़े करता है, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
लोकतंत्र के लिए क्यों खतरनाक है ऐसी चूक
मतदाता सूची किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ होती है। यदि इसमें गलत नाम जुड़ जाएं या असली मतदाताओं के पते से छेड़छाड़ की जाए, तो इसका सीधा असर चुनाव की निष्पक्षता पर पड़ता है। मतदाता पुनरीक्षण अभियान में हुई इस तरह की चूक यह सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं यह सिर्फ लापरवाही है या इसके पीछे कोई संगठित प्रयास।
स्थानीय लोगों में बढ़ती चिंता
इस मामले के सामने आने के बाद इलाके के अन्य लोग भी अपनी मतदाता सूची की जांच करने लगे हैं। कई लोगों को आशंका है कि कहीं उनके पते पर भी बिना जानकारी के किसी अन्य व्यक्ति का नाम न जोड़ दिया गया हो। इससे क्षेत्र में असमंजस और अविश्वास का माहौल बन गया है।
आगे क्या?
अब सबकी निगाहें प्रशासनिक जांच पर टिकी हैं। यह जांच न केवल एक मकान से जुड़े विवाद को सुलझाने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि पूरे मतदाता पुनरीक्षण अभियान की विश्वसनीयता को परखने की कसौटी भी है। यदि दोषियों पर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति से इनकार नहीं किया जा सकता।







