पंचायत चुनाव वोटर लिस्ट में गजब मामला उस समय उजागर हुआ, जब जयसिंहपुर तहसील क्षेत्र से सामने आई शिकायतों ने निर्वाचन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। मतदाता सूची में जिन महिलाओं के नाम पत्नी के रूप में दर्ज हैं, उनकी शादी अभी हुई ही नहीं है। चौंकाने वाली बात यह है कि सरकारी अभिलेखों में यह बदलाव बाकायदा वैध मतदाता संशोधन प्रक्रिया के तहत दिखाया गया, जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है।
शादी से पहले ही पत्नी बन गई दुल्हन
मामला जयसिंहपुर तहसील के मैरी रंजीत गांव का है, जहां निवासी उमेश सिंह ने उपजिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र सौंपकर निर्वाचन प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं की ओर ध्यान दिलाया। शिकायत में बताया गया कि मतदाता सूची की क्रमांक संख्या 1268, मकान संख्या 154 पर संजना सिंह का नाम पत्नी सचिन सिंह के रूप में दर्ज कर दिया गया है। वास्तविकता यह है कि संजना और सचिन की शादी अभी संपन्न ही नहीं हुई है।
शिकायतकर्ता ने अपने दावे के समर्थन में शादी का कार्ड भी प्रस्तुत किया, जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि विवाह की तिथि 5 फरवरी 2026 निर्धारित है। यानी जिस युवती को सरकारी दस्तावेजों में पत्नी दर्शा दिया गया, वह उस समय तक दुल्हन भी नहीं बनी थी। इस तथ्य ने पूरे प्रकरण को साधारण गलती से कहीं आगे, गंभीर अपराध की श्रेणी में ला खड़ा किया।
एक नहीं, दो-दो मामलों से खुला खेल
यह मामला यहीं समाप्त नहीं होता। शिकायतकर्ता ने बताया कि इसी मतदाता सूची में क्रमांक संख्या 918 पर कृतिका सिंह का नाम पत्नी अनुराग सिंह के रूप में दर्ज किया गया है, जबकि इन दोनों की शादी भी आगामी फरवरी माह में होनी प्रस्तावित है। इस तरह दो अलग-अलग मामलों में शादी से पहले ही युवतियों को गांव की मतदाता सूची में पत्नी के रूप में शामिल कर दिया गया।
इन खुलासों ने यह संकेत दे दिया कि मामला किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि संगठित तरीके से की गई प्रक्रिया संबंधी छेड़छाड़ का हो सकता है। यदि ऐसा है, तो यह न केवल चुनावी नियमों का उल्लंघन है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव पर सीधा हमला भी है।
नाबालिग मतदाताओं के नाम जोड़ने का भी आरोप
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ ऐसे युवाओं के नाम भी मतदाता सूची में शामिल कर दिए गए हैं, जिनकी उम्र 1 जनवरी 2026 को भी 18 वर्ष पूरी नहीं हो रही थी। चुनाव आयोग के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अनुसार, निर्धारित कटऑफ तिथि तक 18 वर्ष की आयु पूरी करना अनिवार्य है। इसके बावजूद यदि नाबालिगों को मतदाता बना दिया गया है, तो यह सीधा-सीधा कानून का उल्लंघन है।
इन आरोपों के बाद यह सवाल उठना लाजिमी है कि बीएलओ स्तर पर सत्यापन की प्रक्रिया आखिर कैसे पूरी की गई और किन परिस्थितियों में ऐसे नाम स्वीकृत किए गए।
प्रशासन सख्त, एसडीएम ने कहा— जघन्य अपराध
शिकायतें सामने आते ही प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। उपजिलाधिकारी जयसिंहपुर प्रभात कुमार सिंह ने पूरे मामले को बेहद गंभीर मानते हुए इसे “जघन्य अपराध” की संज्ञा दी है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मतदाता सूची में इस तरह की छेड़छाड़ लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
एसडीएम ने तत्काल जांच के आदेश जारी करते हुए कहा कि यदि बीएलओ या किसी अन्य कर्मचारी की संलिप्तता पाई जाती है, तो उसके खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। इसमें विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ कानूनी कदम भी शामिल होंगे।
बीएलओ की भूमिका पर सवाल
मतदाता सूची तैयार करने और संशोधन की प्रक्रिया में बूथ लेवल ऑफिसर की भूमिका बेहद अहम होती है। स्थानीय स्तर पर सत्यापन की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं पर होती है। ऐसे में यदि गलत नाम, गलत संबंध या अपात्र मतदाताओं के नाम सूची में शामिल हुए हैं, तो बीएलओ की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि जांच में यह भी देखा जाएगा कि कहीं दबाव, राजनीतिक प्रभाव या व्यक्तिगत लाभ के कारण तो नियमों की अनदेखी नहीं की गई।
चुनावी रंजिश और वोट बैंक का गणित
स्थानीय लोगों का मानना है कि पंचायत चुनाव में एक-एक वोट बेहद कीमती होता है। यही कारण है कि भावी प्रत्याशी और उनके समर्थक पहले से ही संभावित वोट बैंक तैयार करने की कोशिश में जुट जाते हैं। बाहरी लड़कियों को शादी से पहले ही गांव की वोटर लिस्ट में शामिल कर देना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
यह तरीका न सिर्फ अनैतिक है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने वाला भी है। यदि ऐसे मामलों पर समय रहते सख्ती नहीं की गई, तो निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा ही खतरे में पड़ सकती है।
लोकतंत्र की जड़ों पर असर
पंचायत चुनाव वोटर लिस्ट में गजब मामला केवल एक गांव या एक तहसील तक सीमित नहीं है। यह उस व्यवस्था की खामी को उजागर करता है, जहां नियमों के पालन से अधिक राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता दी जाती है। मतदाता सूची लोकतंत्र की आधारशिला होती है और उसमें की गई हर गड़बड़ी पूरे चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ऐसे मामलों में उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोक पाना मुश्किल हो जाएगा।
जांच से क्या निकल सकता है?
अब सभी की निगाहें प्रशासनिक जांच पर टिकी हैं। यह जांच तय करेगी कि यह लापरवाही थी, साजिश थी या फिर किसी दबाव का नतीजा। साथ ही यह भी स्पष्ट होगा कि मतदाता सूची में संशोधन की पूरी प्रक्रिया किस स्तर पर विफल हुई।
प्रशासनिक कार्रवाई के साथ-साथ यह मामला चुनाव आयोग तक भी पहुंच सकता है, जिससे भविष्य में ऐसे संशोधनों पर और कड़ा नियंत्रण लागू किया जा सके।
निष्कर्ष
शादी से पहले ही पत्नी बना देना, नाबालिगों को मतदाता बना देना और नियमों को दरकिनार करना—ये सभी बातें मिलकर यह साबित करती हैं कि पंचायत चुनाव वोटर लिस्ट में गजब मामला केवल एक त्रुटि नहीं, बल्कि लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ है। प्रशासन की सख्ती और निष्पक्ष जांच ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि भविष्य में मतदाता सूची की पवित्रता बनी रहे और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा कायम रहे।







