पंचायत चुनाव से पहले बलरामपुर में सत्ता की बेचैनी

घोषणा से पहले ‘भौकाल’, पाँच वर्षों का लेखा-जोखा और पंचायत सत्ता की निर्णायक लड़ाई

बलरामपुर जिले में पंचायत चुनाव से पहले ग्रामीण राजनीति, भावी प्रत्याशियों की सक्रियता और सत्ता संघर्ष का दृश्य

अब्दुल मोबीन सिद्दीकी की रिपोर्ट
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उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की विधिवत घोषणा भले ही अभी नहीं हुई हो, लेकिन बलरामपुर जिले में राजनीतिक हलचल तेज़ हो चुकी है। गांवों, कस्बों और पंचायत स्तर पर जिस तरह से भावी प्रत्याशी सक्रिय दिखाई दे रहे हैं, उससे साफ है कि चुनावी राजनीति अब अधिसूचना की मोहताज नहीं रही। सामाजिक, धार्मिक और सार्वजनिक मंचों पर संभावित उम्मीदवारों की मौजूदगी एक सुनियोजित रणनीति के तहत देखी जा रही है।

बलरामपुर में पंचायत प्रतिनिधि होना केवल विकास योजनाओं के क्रियान्वयन तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि यह सामाजिक प्रभाव, प्रशासनिक पहुंच और भविष्य की राजनीति का प्रवेश द्वार समझा जाता है। यही कारण है कि चुनाव से पहले ही सत्ता की बेचैनी यहां सतह पर दिखाई देने लगी है।

बलरामपुर की पंचायत राजनीति: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

वर्ष 2015 के पंचायत चुनावों में बलरामपुर की राजनीति अपेक्षाकृत शांत रही। कई ग्राम पंचायतों में निर्विरोध चुनाव हुए या मुकाबला सीमित रहा। सत्ता कुछ प्रभावशाली परिवारों और समूहों के बीच केंद्रित रही, जिसे उस समय स्थिरता माना गया। लेकिन यही स्थिरता धीरे-धीरे ग्रामीण समाज में असंतोष का कारण बनी।

पिछले कार्यकाल में सड़क, नाली, आवास और पेंशन जैसी योजनाओं को लेकर यह धारणा मजबूत हुई कि विकास कार्य चयनात्मक रहे। जिनकी सत्ता और प्रशासन तक सीधी पहुंच थी, उन्हें प्राथमिकता मिली—यही वह बिंदु था जहां पंचायत व्यवस्था पर सवाल उठने लगे।

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2021 का पंचायत चुनाव: उम्मीदें, संघर्ष और अधूरा परिवर्तन

2021 के पंचायत चुनाव में युवा दावेदारों और नए चेहरों की संख्या बढ़ी। कई पंचायतों में सीधी टक्कर देखने को मिली और गांवों में सत्ता परिवर्तन की उम्मीद जगी। हालांकि परिणामों ने आंशिक बदलाव जरूर दिखाया, लेकिन पूरी सत्ता संरचना नहीं बदली।

कई पुराने प्रभावशाली चेहरे दोबारा सत्ता में लौटे, जबकि हारने वाले प्रत्याशी राजनीति से बाहर नहीं हुए। यही अधूरा बदलाव आज की सक्रियता और पहले से शुरू हुए चुनावी माहौल की सबसे बड़ी वजह बन रहा है।

ब्लॉक-वार राजनीतिक और विकासात्मक विश्लेषण

◆ तुलसीपुर ब्लॉक

तुलसीपुर ब्लॉक राजनीतिक रूप से सबसे सक्रिय माना जाता है। यहां सड़क और आवास योजनाओं पर काम जरूर हुआ, लेकिन आंतरिक गलियों और टोलों की स्थिति अब भी असंतोष का कारण है। भावी प्रत्याशी इस ब्लॉक में सबसे पहले मैदान में उतरे हैं।

◆ उतरौला ब्लॉक

उतरौला ब्लॉक जनसंख्या और पंचायत सीटों के लिहाज से अहम है। यहां आवास और पेंशन योजनाओं का दायरा बढ़ा, लेकिन चयन प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल उठते रहे। यही वजह है कि यहां राजनीतिक मुकाबला सबसे कड़ा माना जा रहा है।

◆ गैसड़ी ब्लॉक

गैसड़ी ब्लॉक में स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर बड़े वादे किए गए थे। कुछ ढांचागत सुधार जरूर हुए, लेकिन संसाधनों और स्टाफ की कमी बनी रही। यह ब्लॉक वर्तमान असंतोष का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है।

◆ श्रीदत्तगंज ब्लॉक

यहां कृषि मार्ग और रोजगार के वादे प्रमुख रहे। कुछ सड़कें बनीं, लेकिन स्थायी रोजगार और सिंचाई जैसी समस्याएं अब भी जस की तस हैं। ग्रामीणों के बीच यह धारणा मजबूत है कि योजनाएं आईं, लेकिन असर सीमित रहा।

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◆ पचपेड़वा ब्लॉक

सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण पचपेड़वा ब्लॉक में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर अपेक्षाएं अधिक थीं। भवन बने, लेकिन मानव संसाधन और गुणवत्ता अब भी चुनौती बने हुए हैं।

पाँच वर्षों का विकास बनाम वादे

पिछले पंचायत कार्यकाल में बुनियादी सुविधाओं को लेकर बड़े वादे किए गए। मुख्य सड़कों का निर्माण हुआ, लेकिन कई गांवों में आज भी बरसात के दिनों में हालात नहीं बदलते। नल से जल योजना का ढांचा खड़ा हुआ, लेकिन रखरखाव कमजोर रहा।

मनरेगा के तहत रोजगार मिला, लेकिन यह अस्थायी साबित हुआ। स्थायी आजीविका और स्थानीय रोजगार आज भी ग्रामीणों की प्रमुख मांग बनी हुई है।

निष्कर्ष: पंचायत चुनाव और बलरामपुर का भविष्य

बलरामपुर में पंचायत चुनाव की घोषणा भले ही बाकी हो, लेकिन राजनीतिक संघर्ष शुरू हो चुका है। यह लड़ाई केवल पदों की नहीं, बल्कि प्रभाव, पहचान और प्रशासनिक पहुंच की है। आज का भौकाल कल की सत्ता की दिशा तय करेगा।

आगामी पंचायत चुनाव यह तय करेगा कि पंचायतें वास्तव में विकास का माध्यम बनेंगी या फिर एक बार फिर स्थानीय सत्ता के पुनर्वितरण का साधन साबित होंगी।

बलरामपुर पंचायत चुनाव से जुड़े अहम सवाल–जवाब

बलरामपुर में पंचायत चुनाव से पहले राजनीतिक हलचल क्यों तेज हो गई है?
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पिछले पंचायत कार्यकाल में हुए अधूरे विकास, सत्ता से बाहर रहने की पीड़ा और आगामी चुनाव में प्रभाव बनाए रखने की होड़ के कारण बलरामपुर में घोषणा से पहले ही राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं।

पिछले पांच वर्षों में पंचायत स्तर पर सबसे बड़ा असंतोष किस बात को लेकर रहा?

ग्रामीणों में सबसे ज्यादा असंतोष चयनात्मक विकास, आवास व पेंशन योजनाओं की अपारदर्शी प्रक्रिया और स्थायी रोजगार के अवसरों की कमी को लेकर देखा गया।

बलरामपुर के कौन-कौन से ब्लॉक पंचायत चुनाव में सबसे अहम माने जा रहे हैं?

तुलसीपुर, उतरौला, गैसड़ी, श्रीदत्तगंज और पचपेड़वा ब्लॉक राजनीतिक और जनसंख्या के लिहाज से सबसे अहम माने जा रहे हैं, जहां मुकाबला सबसे कड़ा रहने की संभावना है।

‘भौकाल’ की राजनीति से क्या तात्पर्य है?

यह शब्द भावी प्रत्याशियों द्वारा लगातार सामाजिक उपस्थिति, प्रशासनिक पहुंच के प्रदर्शन और गांव में प्रभाव जमाने की रणनीति को दर्शाता है, जो चुनाव से पहले दिखाई देती है।

क्या पंचायत चुनाव में इस बार मतदाता का रुख बदला हुआ नजर आ रहा है?

ग्रामीण मतदाता इस बार केवल वादों से संतुष्ट नहीं दिख रहा। पिछले प्रदर्शन, विकास कार्यों की गुणवत्ता और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर सवाल अधिक मुखर हुए हैं।

पंचायत चुनाव बलरामपुर की राजनीति के लिए क्यों निर्णायक माने जा रहे हैं?

यह चुनाव तय करेगा कि आने वाले पांच वर्षों तक गांवों में सत्ता, प्रशासनिक पहुंच और स्थानीय नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा, इसलिए इसे भविष्य की राजनीति का आधार माना जा रहा है।

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