✍️ संपादकीय | अनिल अनूप
यह कोई साधारण समाचार नहीं है। यह न तो किसी विद्यालय की औपचारिक उपलब्धि सूची है और न ही वार्षिक परीक्षा परिणामों का उत्सव। सलेमपुर (देवरिया) से उठी यह घटना वस्तुतः भारतीय शिक्षा-दृष्टि, हिंदी भाषा की गरिमा और ग्राम्य प्रतिभा के आत्मसम्मान का ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज़ है, जो आने वाले समय में केवल एक सफलता कथा के रूप में नहीं, बल्कि एक वैचारिक संदर्भ के रूप में पढ़ा जाएगा। यह उस क्षण का साक्ष्य है, जब लंबे समय से हाशिये पर रखे गए भूगोल ने केंद्र में खड़े होकर अपने अस्तित्व और अपनी सामर्थ्य—दोनों की एक साथ घोषणा की।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ओलंपियाड 2025, जिसे हिंदी ओलंपियाड फाउंडेशन द्वारा आयोजित किया गया, अपने आप में केवल एक प्रतियोगिता नहीं है। यह हिंदी भाषा को लेकर वैश्विक आत्मविश्वास की एक जीवंत प्रयोगशाला है, जहाँ भाषा केवल प्रश्नों और उत्तरों का माध्यम नहीं रहती, बल्कि बौद्धिक पहचान का औज़ार बन जाती है। और जब इस प्रयोगशाला में देवरिया के ग्रामांचल में स्थित जी एम एकेडमी के बच्चे तेरह स्वर्ण, सोलह रजत और आठ कांस्य पदक लेकर खड़े होते हैं, तब यह घटना व्यक्तिगत उपलब्धि से ऊपर उठकर सामूहिक चेतना का प्रतीक बन जाती है।
हिंदी : केवल भाषा नहीं, सभ्यता की स्मृति
हिंदी की यात्रा केवल अक्षरों और शब्दों की यात्रा नहीं है। यह स्मृति की यात्रा है—संस्कृति, संघर्ष, संवेदना और विचार की यात्रा। हिंदी अपने भीतर केवल संवाद नहीं, बल्कि सभ्यता की पूरी विरासत समेटे हुए है। आज के समय में, जब भाषा को बाज़ार, रोज़गार और तात्कालिक उपयोगिता के तराजू पर तौला जा रहा है, तब हिंदी का अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बौद्धिक प्रतिस्पर्धा के रूप में प्रतिष्ठित होना अपने आप में एक गहरा वैचारिक प्रतिरोध है।
यह प्रतिरोध उस मानसिकता के विरुद्ध है, जो मानती है कि वैश्विक होना केवल अंग्रेज़ी में संभव है। जी एम एकेडमी के बच्चों ने अपने प्रदर्शन से यह दिखा दिया कि हिंदी में सोचने वाला मन भी वैश्विक हो सकता है—और कई बार अधिक गहराई, अधिक संवेदना और अधिक नैतिक स्पष्टता के साथ। यह उपलब्धि हिंदी के आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना है।
जब कक्षा नहीं, चेतना बोलती है
इस उपलब्धि की सबसे सुंदर और अर्थपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें आयु या कक्षा का कोई विशेषाधिकार नहीं है। कक्षा पहली की नाव्या श्रीवास्तव से लेकर कक्षा दसवीं की सलोनी चौहान तक—यह क्रम किसी सीढ़ी का नहीं, बल्कि एक वृत्त का आभास देता है, जहाँ हर बिंदु समान रूप से प्रकाशित है। यहाँ न छोटा है, न बड़ा—यहाँ केवल प्रतिभा है।
यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा किसी पाठ्यक्रम, किसी कक्षा या किसी उम्र की मोहताज नहीं होती। जहाँ वातावरण प्रेरक हो, जहाँ भाषा को भय नहीं बल्कि मित्र की तरह प्रस्तुत किया जाए, वहाँ बालक भी विचारक बन जाता है। जी एम एकेडमी के बच्चों ने यही कर दिखाया।
देवरिया का ग्रामांचल : परिधि से केंद्र की ओर
भारतीय शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय तक एक मौन और लगभग स्वीकार कर लिया गया विभाजन रहा है—शहर और गाँव का। शहर को अवसरों का केंद्र और गाँव को प्रतीक्षा का स्थल मान लिया गया। लेकिन जी एम एकेडमी की यह उपलब्धि उस विभाजन को न केवल चुनौती देती है, बल्कि उसे खारिज भी करती है।
देवरिया का ग्रामांचल यह सिद्ध करता है कि प्रतिभा का जन्म स्थान नहीं होता, केवल पहचान का अवसर होता है। और जब वह अवसर मिलता है, तो वही मिट्टी, जो हल चलाती है, वही मिट्टी इतिहास भी लिखती है। यह उपलब्धि ग्रामीण भारत के आत्मविश्वास की पुनर्प्राप्ति है।
पदकों के पीछे छिपी साधना और संघर्ष
पदक चमकते हैं, पर उस चमक के पीछे वर्षों का श्रम, अनुशासन और धैर्य छिपा होता है। ग्रामीण परिवेश में शिक्षा देना केवल पाठ पढ़ाना नहीं है—यह सामाजिक, आर्थिक और मानसिक सीमाओं से निरंतर संवाद करना है। यहाँ हर उपलब्धि के पीछे एक अदृश्य संघर्ष होता है, जो मंच पर दिखाई नहीं देता।
यहाँ शिक्षक केवल पाठ्यक्रम के संवाहक नहीं होते, बल्कि संभावनाओं के निर्माता होते हैं। सीमित संसाधनों के बीच बच्चों में असीम आत्मविश्वास जगाना कोई साधारण कार्य नहीं। यह एक प्रकार की तपस्या है—जो न तो प्रमाणपत्रों में दर्ज होती है और न ही पुरस्कार मंचों पर पढ़ी जाती है, पर परिणामों में स्पष्ट रूप से बोलती है।
प्रधानाचार्य की दृष्टि : प्रशासन नहीं, दर्शन
प्रधानाचार्य मोहन द्विवेदी का वक्तव्य केवल सूचना नहीं देता, वह एक संपूर्ण शैक्षणिक दर्शन को प्रकट करता है। ऐसा दर्शन, जिसमें हिंदी को बोझ या बाधा नहीं, बल्कि संस्कार और संभावना के रूप में देखा जाता है। यही दृष्टि किसी विद्यालय को साधारण से असाधारण बनाती है।
जिस विद्यालय में भाषा केवल पढ़ाई नहीं जाती, बल्कि जीवन की लय के रूप में स्वीकार की जाती है, वहाँ ऐसे परिणाम आकस्मिक नहीं होते—वे अनिवार्य होते हैं। जी एम एकेडमी का उदाहरण इसी सत्य की पुष्टि करता है।
शिक्षक : इतिहास के मौन शिल्पकार
इतिहास अक्सर विजेताओं के नाम लिखता है, पर वास्तविक निर्माणकर्ता पंक्तियों के बीच छूट जाते हैं। इस उपलब्धि के पीछे वे शिक्षक हैं, जिन्होंने बच्चों में हिंदी के प्रति भय नहीं, अपनत्व जगाया। जिन्होंने व्याकरण को कठोर अनुशासन नहीं, बल्कि भाषा की संगीतात्मकता के रूप में प्रस्तुत किया।
उन्होंने परीक्षा को डर नहीं, खोज बना दिया। ऐसे शिक्षक किसी समाचार की सुर्खी नहीं बनते, पर वही भविष्य की इबारत लिखते हैं। यह संपादकीय उन्हीं मौन शिल्पकारों के प्रति एक नमन भी है।
निष्कर्ष : एक उपलब्धि, एक चेतावनी, एक दिशा
जी एम एकेडमी, सलेमपुर की यह सफलता केवल एक विद्यालय की कहानी नहीं है। यह भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए एक चेतावनी भी है और एक दिशा-सूचक भी। चेतावनी यह कि यदि ग्रामांचल की उपेक्षा जारी रही, तो हम असंख्य संभावनाओं को खो देंगे। दिशा यह कि यदि भाषा, संस्कृति और शिक्षा को आत्मसम्मान के साथ जोड़ा जाए, तो भारत की बौद्धिक शक्ति कहीं अधिक व्यापक और गहरी हो सकती है।
यह संपादकीय किसी क्षणिक उत्साह का परिणाम नहीं है। यह एक ऐतिहासिक संकेत है—कि यदि हमने ऐसी पहलों को गंभीरता से लिया, तो हिंदी केवल अतीत की स्मृति नहीं रहेगी, बल्कि भविष्य की भाषा बनेगी। यह केवल समाचार नहीं है। यह इतिहास के पन्ने पर दर्ज होता हुआ एक स्थायी हस्ताक्षर है।









देश की राजनीति में योजनाओं के नाम बदलना कोई नई घटना नहीं है, लेकिन जब वही प्रक्रिया सत्ता बदलने के साथ अचानक ‘लोकतंत्र पर हमला’ घोषित कर दी जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। इन दिनों मनरेगा को लेकर विपक्ष का हंगामा इसी चयनात्मक स्मृति का उदाहरण बन गया है। नाम बदलने की आशंका मात्र से संसद ठप कर दी गई, जबकि इतिहास गवाह है कि कांग्रेस शासन में एक ही दिन में छह योजनाओं के नाम बदले गए थे और तब न लोकतंत्र खतरे में दिखा, न संवैधानिक मूल्यों की दुहाई दी गई।