
बुंदेलखंड के पाठा इलाके को हम अकसर कुछ शब्दों में समेट देने की गलती करते हैं—डकैत, जंगल और पिछड़ापन। लेकिन जब नज़रिया थोड़ा गहरा होता है, तो सामने आता है कि यहां के सुदूरवर्ती पिछड़े वर्ग के लोगों के पास अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है, संघर्ष से गढ़ी सभ्यता है, विशिष्ट रहन–सहन है, रंग–बिरंगी परंपराएं हैं और एक जटिल लेकिन जीवंत सामाजिक संरचना है। यही पाठा है—चित्रकूट, मानिकपुर, मारकुंडी, बरगढ़, मानपुर, पहाड़ी और आसपास के खुरदरे पठारी गांवों का वह इलाका, जो बुंदेलखंड की आत्मा में बसा है और जिसे दशकों तक सिर्फ दस्यु–प्रभावित क्षेत्र के तौर पर देखा जाता रहा।
पाठा की भौगोलिक पृष्ठभूमि और ‘पिछड़ेपन’ की जड़ें
‘पाठा’ शब्द अपने भीतर ही भूगोल का संकेत छिपाए है—ऊबड़–खाबड़ पठार, पथरीली चट्टानें, गहरी घाटियां और झाड़ियों–जंगल से ढकी धरती। चित्रकूट और बांदा ज़िले का यह हिस्सा बुंदेलखंड की सूखी और संवेदनशील ज़मीन का प्रतिनिधि माना जाता है। यहां जलसंकट पुराना है, वर्षा कम और अस्थिर रहती है और मिट्टी की पतली कुरसियानी परत खेती को हमेशा जोखिम से भरा काम बना देती है। यही कठोर भौगोलिक ढांचा पाठा के सामाजिक–आर्थिक पिछड़ेपन की असली जड़ है।
जब ज़मीन पर्याप्त उपज नहीं देती, बरसात भरोसेमंद न रहे और गांव के भीतर रोज़गार के वैकल्पिक साधन तैयार न हों, तो पूरे–के–पूरे गांव पलायन की ओर धकेल दिए जाते हैं। मजदूरी की तलाश में परिवारों का बेबस होकर महानगरों की ओर निकल जाना, पाठा की रोजमर्रा की सच्चाई बन चुका है।
जातीय–सामाजिक संरचना : दलित–पिछड़े समाज की मजबूत रीढ़
बुंदेलखंड की समग्र आबादी की तरह पाठा में भी सबसे बड़ी हिस्सेदारी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की है, जबकि अनुसूचित जातियां (SC) राष्ट्रीय औसत से अधिक अनुपात में मौजूद हैं। यह इलाका अपनी सामाजिक रचना में पूरी तरह दलित–पिछड़े समाज की रीढ़ पर खड़ा दिखाई देता है।
- ओबीसी समुदाय — यादव, कुर्मी, काछी, लोधी, अहिरवार, कोरी, कुम्हार, तैली, नाई, धोबी इत्यादि
- अनुसूचित जाति समुदाय — जाटव/चमार, धोबी, पासी, कोरी आदि
इनमें से कई जातियां अब पंचायतों, स्थानीय राजनीति, छोटे व्यवसायों और शिक्षा के सहारे प्रभावशाली होती जा रही हैं, जबकि कुछ समुदाय आज भी पीढ़ियों से चली आ रही मेहनत–केंद्रित भूमिकाओं, सीमित संसाधनों और सामाजिक असमानताओं के बोझ से जूझ रहे हैं। भूमिहीनता, बंटाई पर खेती और कर्ज़ के चक्र ने पिछड़े वर्ग की बड़ी आबादी को असुरक्षा में घेर रखा है।
सांस्कृतिक विरासत : लोकगीतों, कथाओं और स्मृतियों का पाठा
पाठा की असली पहचान उसके लोकगीतों, लोक–नृत्यों और पीढ़ी–दर–पीढ़ी चली आ रही कहानियों में छिपी है। यहां के उत्सव और रोज़मर्रा का जीवन एक–दूसरे से अलग नहीं, बल्कि गहराई से जुड़े हुए हैं। खेतों में हल चलाने से लेकर शादी–विवाह, मेले और धार्मिक अनुष्ठान तक हर मौके के लिए अलग–अलग लोकधुनें और पारंपरिक गीत सुनाई देते हैं।
- राई नृत्य — बेड़िया समुदाय से जन्मा यह नृत्य आज पूरे बुंदेलखंड की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। तेज़ लय, गोल घेरा, तालियों और घुंघरुओं के साथ औरतों का यह नृत्य जीवन की चंचलता और जिजीविषा दोनों को एक साथ अभिव्यक्त करता है।
- फाग, होरी, करमा, आल्हा — मौसम, त्यौहार और सामूहिकता के प्रतीक गीत, जिनमें संघर्ष भी है और उत्सव का उल्लास भी।
- बधाइयाँ और गारी — विवाह के समय गाए जाने वाले गीत, जिनमें रिश्तों की मिठास के साथ हल्का–फुल्का व्यंग्य और हंसी–ठिठोली भी शामिल रहती है।
- कजरी — बरसात के इंतज़ार, सूखे के दर्द और मन की उदासी को स्वर देने वाली लोकधुन, जो इस क्षेत्र के जल–संकट को भावनात्मक भाषा देती है।
लोक–कथाओं, वीर–गाथाओं और देवी–देवताओं की लोक–आस्थाओं से भरा यह सांस्कृतिक संसार पाठा को केवल भूगोल नहीं बल्कि एक जीवित, सांस लेती हुई सांस्कृतिक इकाई बना देता है। मंदिर, डेहरियां, ग्राम–देवता और मेलों के ज़रिए यह संस्कृति आज भी गांव–गांव में धड़कती है।
ग्रामीण बोलियों का अनोखा संगम : बुंदेली लोकभाषा की मिठास
पाठा के सांस्कृतिक भूगोल में लोकभाषा धीरे–धीरे बहती नदी की तरह है—शांत, सहज और बेहद आत्मीय। यहां की रोज़मर्रा की भाषा बुंदेली है, जिसमें ब्रज, अवधी और स्थानीय ग्रामीण बोलियों का अनोखा संगम दिखाई देता है। गांव की चौपाल, खेत, हाट–बाज़ार, शादी–समारोह और यहां तक कि कड़ी मेहनत के बीच भी यही भाषा संवाद की असली ताकत बनकर सामने आती है।
कुछ सामान्य वाक्य अपने आप में मनुष्य की गर्माहट और आपसी निकटता को व्यक्त कर देते हैं, जैसे— “कइसे हो भइया?”, “कर्जा भारी पाड़ रहौ है”, “पानी ना बरसै तौ फसल बिगड़ जै”, “घर–परिवार मा सब ठीक तो?”। बुंदेली के शब्दों की सादगी ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है—“जइसे–तइसे” कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का साहस, “मनुआ टूट गओ” मन के आहत होने का बिंब और “परतारिन” मेहनतकश स्त्रियों के धैर्य का सम्मान है।
लोकभाषा परंपरा के संरक्षण का माध्यम भी है। लोकगीत, हास्य–व्यंग्य, कहावतें और राई के गीत आज भी अधिकतर बुंदेली में ही गाए जाते हैं। यही भाषा बच्चों को दुनिया की पहली समझ देती है और बुज़ुर्गों की स्मृतियों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाती है। यूं कहा जाए कि बुंदेली केवल बोली नहीं, बल्कि पहचान, स्मृति, संघर्ष और अपनत्व की सामूहिक भाषा है।
रहन–सहन : कठोर भूगोल में सादा लेकिन संघर्षपूर्ण जीवन
पाठा के गांव अक्सर पहाड़ी ढलानों और पठारी सतहों पर बसे हुए हैं। यहां के घर ज़्यादातर मिट्टी, पत्थर, खपरैल और फूस से बने होते हैं। सामने छोटा–सा आंगन, बगल में पशुओं का स्थान और पीछे बाड़ी यानी सब्ज़ियों की छोटी क्यारी—यह दृश्य अधिकांश गांवों में समान दिखता है।
पुरुष आम तौर पर धोती–कुर्ता या लुंगी–कमीज़ पहनते हैं, सिर पर गमछा बांधना उनकी पहचान है। स्त्रियां साड़ी या घाघरा–ब्लाउज़ में दिखती हैं, हालांकि नई पीढ़ी में सलवार–कमीज़ भी अपनाई जा रही है। भोजन में मोटे अनाज, दालें, हरी–पत्तेदार सब्ज़ियां, कंद–मूल, महुआ और मौसमी फसलें प्रमुख हैं।
खेती और पशुपालन यहां की मुख्य आजीविका हैं, पर वर्षा–आधारित ज़मीन के कारण ये हमेशा अनिश्चित बनी रहती हैं। यही वजह है कि मजदूरी, ईंट–भट्ठों पर काम और महानगरों की ओर मौसमी पलायन, जीवनयापन का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं। जलसंकट तो मानो रोज़ की सबसे लंबी लड़ाई है—गर्मियों में स्त्रियों और बच्चों को कई–कई किलोमीटर दूर तक पानी के लिए जाना पड़ता है।
परिवार, स्त्री और सामुदायिक रिश्ते
पाठा की सामाजिक संरचना में संयुक्त परिवार की परंपरा अब “छोटे संयुक्त परिवार” में बदलती दिखती है—रसोई अलग, लेकिन खेत, आंगन और सामाजिक निर्णय बड़े पैमाने पर साझा। संपत्ति छोटे–छोटे हिस्सों में बंटी है, फिर भी परिवार और बिरादरी की एकता रोजमर्रा के जीवन को सहारा देती है।
स्त्रियां घर, खेत, पशुपालन, पानी भरने और बच्चों की परवरिश की सबसे बड़ी ज़िम्मेदार हैं। बच्चियों की पढ़ाई के प्रति जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन दूरस्थ स्कूल, सुरक्षित परिवहन की कमी और घरेलू कामों का बोझ अभी भी उनकी शिक्षा के रास्ते में भारी रुकावट हैं। गांव की बैठकों और जाति–पंचायतों की भूमिका आज भी मजबूत है—कई बार ये न्याय का मंच बनती हैं तो कभी–कभी रूढ़ियों को बचाने का औज़ार भी।
डकैतों की छाया से विकास की कोशिश तक
ददुआ, ठोकिया, बलखड़िया जैसे डकैतों के कारण पाठा दशकों तक भय और हिंसा की पहचान से घिरा रहा। पुलिस और डकैतों के बीच मुठभेड़ों का सबसे बड़ा बोझ गरीब किसानों, दलित–पिछड़े समुदायों और आम ग्रामीणों पर पड़ा। जंगलों में गोलियों की गूंज, रात होते ही सन्नाटा और हर अजनबी पर शक—यह सब इस इलाके की सामूहिक स्मृति का हिस्सा है।
2000 के दशक के बाद संयुक्त पुलिस अभियानों और नीतिगत सख्ती के परिणामस्वरूप बड़े–बड़े गैंगों का प्रभाव खत्म हुआ और जंगलों में धीरे–धीरे शांति लौटी। इसके बाद सड़कों, पुलिस चौकियों, पर्यटन स्थलों (जैसे शबरी जलप्रपात, रानीपुर विहार) और धार्मिक केंद्रों के पुनर्विकास ने विकास की नई दिशा दिखानी शुरू की। फिर भी डकैत–काल की याद लोककथाओं और बुज़ुर्गों की जुबान पर आज भी ताज़ा है—यह क्षेत्र के ऐतिहासिक घाव भी है और सामूहिक साहस का प्रतीक भी।
शिक्षा, स्वास्थ्य और आधुनिकता की धीमी कदमताल
- प्राथमिक और जूनियर स्कूल अधिकांश गांवों के आस–पास मौजूद हैं, लेकिन उच्च शिक्षा के लिए कस्बों और शहरों की दूरी, फीस और सुविधाओं की कमी बड़ा अवरोध बन जाती है।
- स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या कम है, दवाओं और डॉक्टरों की कमी आम शिकायत है। पोषण, स्वच्छ जल और मलेरिया–डायरिया जैसी बीमारियां अब भी बड़ी चुनौती हैं।
- डिजिटल माध्यमों की पहुंच तेज़ी से बढ़ी है, लेकिन मोबाइल–डेटा और स्मार्टफोन के बावजूद रोजगार और अवसरों तक वास्तविक पहुंच अभी भी बहुत सीमित है।
नई पीढ़ी पढ़–लिखकर, प्रतियोगी परीक्षाएं देकर और शहरों में नौकरी पकड़कर पाठा से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है। कई युवा अपने गांव लौटकर खेती को वैज्ञानिक तरीकों से सुधारने, पशुपालन और छोटे–छोटे व्यवसाय शुरू करने की भी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह रास्ता अब भी लंबा और कठिन है।
सांस्कृतिक विरासत और विकास की खींचतान
हाल के वर्षों में बुंदेली उत्सव, लोक–नृत्य कार्यक्रम, पारंपरिक कलाकारों के मंच और ग्रामीण पर्यटन जैसे प्रयासों ने पाठा और पूरे बुंदेलखंड की सांस्कृतिक पहचान को नया मंच दिया है। फिर भी आधुनिकता, बाजारवाद और पलायन के कारण लोकगीतों, लोकपकवानों और ग्रामीण जीवन–पद्धति पर दबाव बढ़ा है। गांव के बच्चे मोबाइल और टीवी की दुनिया में तेजी से खिंच रहे हैं, जिससे लोक–संस्कृति का स्वाभाविक हस्तांतरण कमजोर होता जा रहा है।
स्थानीय संस्कृति का संरक्षण केवल उत्सव मनाने से संभव नहीं होगा, बल्कि शिक्षा, पाठ्यक्रम, ग्राम–स्तरीय सांस्कृतिक मंचों, लोक–कलाकारों को आर्थिक सहयोग और समाज के सामूहिक संकल्प से ही इसे दीर्घकालिक आधार मिल सकता है। जितना पाठा की संस्कृति बचेगी, उतना ही यह इलाका अपनी जड़ों से जुड़ा रह पाएगा।
निष्कर्ष : टूटने से इनकार करता पाठा, जो इतिहास रचता है
पाठा का सुदूरवर्ती पिछड़ा समाज भले सरकारी रिकॉर्ड में “अत्यंत वंचित” के रूप में दर्ज हो, लेकिन ज़मीनी सच यह है कि यहां संघर्ष, आत्मसम्मान, सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक जीवटता का एक अनोखा संसार बसता है। यहां की लोकभाषा पहचान है, लोकगीत उम्मीद हैं, परंपराएं स्तंभ हैं और श्रम जीवन की अनिवार्य सच्चाई।
भय, भूख और बंजर ज़मीन के बीच भी पाठा ने संस्कृति को टूटने नहीं दिया। यही कारण है कि यह इलाका सिर्फ योजनाओं के आंकड़ों में दर्ज कोई “समस्या–ग्रस्त क्षेत्र” नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक भूगोल है, जिसे समझना और सम्मान देना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
पाठा से जुड़े कुछ आम सवाल–जवाब
पाठा इलाके को पिछड़ा क्यों माना जाता है?
सूखा, अस्थिर वर्षा, कमज़ोर मिट्टी, सीमित सिंचाई सुविधाएं, बुनियादी ढांचे की कमी, रोजगार के अभाव और लंबे समय तक डकैतों की दहशत—ये सभी कारण मिलकर पाठा को प्रशासनिक भाषा में पिछड़ा क्षेत्र बना देते हैं। हालांकि सांस्कृतिक और मानवीय दृष्टि से यह इलाका बेहद समृद्ध है।
क्या पाठा के लोगों की मुख्य आजीविका सिर्फ खेती ही है?
खेती और पशुपालन मुख्य आजीविका अवश्य हैं, लेकिन वर्षा–आधारित खेती की अनिश्चितता के कारण बड़ी आबादी मजदूरी, ईंट–भट्ठों में काम, निर्माण कार्य और दूर–दराज़ शहरों में पलायन पर भी निर्भर है। कई परिवार साल का बड़ा हिस्सा बाहर काम करके गुज़ारते हैं।
बुंदेली लोकभाषा पाठा की संस्कृति के लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
बुंदेली लोकभाषा ही लोकगीतों, कहावतों, लोककथाओं और सामान्य बातचीत की भाषा है। यही बच्चों को पहली बार दुनिया से परिचित कराती है और बुज़ुर्गों की स्मृतियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाती है। भाषा के बिना पाठा की संस्कृति, गीत, हास्य, दर्द और संघर्ष को समझ पाना लगभग असंभव है।
क्या विकास योजनाओं से पाठा की तस्वीर बदल रही है?
सड़कों, बिजली, पेयजल, शिक्षा और पर्यटन विकास की योजनाओं ने कुछ इलाकों की तस्वीर ज़रूर बदली है, लेकिन व्यापक स्तर पर अभी बहुत काम बाकी है। असली परिवर्तन तभी संभव होगा जब स्थानीय समुदाय, शासन–प्रशासन और नीति–निर्माता मिलकर क्षेत्र की सांस्कृतिक–सामाजिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए टिकाऊ विकास की दिशा में कदम बढ़ाएंगे।









