फांसी वाली रामलीला : गोंडा की 200 साल पुरानी परंपरा, जहां मंच पर अपराधी को दी जाती है सजा-ए-मौत

गोंडा के करनैलगंज में आयोजित फांसी वाली रामलीला का दृश्य, जिसमें मंच पर अपराधी को सांकेतिक फांसी दी जा रही है, हजारों दर्शक इसे देख रहे हैं

फांसी वाली रामलीला: परंपरा और संदेश का अनोखा संगम

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चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के करनैलगंज में चल रही ऐतिहासिक फांसी वाली रामलीला इस बार भी अपने अनोखे मंचन और सांस्कृतिक संदेश को लेकर सुर्खियों में रही। दशहरे से एक दिन पहले आयोजित इस विशेष दृश्य में चोरी और हत्या के आरोपी अपराधी को सरेआम फांसी की सजा दी जाती है। हालांकि यह पूरी तरह से नाट्य प्रस्तुति है, लेकिन इसकी जीवंतता इतनी गहरी होती है कि हजारों दर्शक इसे असली घटना मानकर देखना पसंद करते हैं।

समाज में जागरूकता फैलाने का मंच

इस फांसी वाली रामलीला का मुख्य उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है। यह समाज में जागरूकता पैदा करने और अपराध के परिणाम को समझाने का एक प्रभावशाली माध्यम है। 

नाटक में दर्शाया जाता है कि कैसे एक काबुली व्यापारी दशहरे के मेले में व्यापार करने आता है, और उसके बेटे की हत्या कर अपराधी नकदी और सामान लूट लेता है। इसके बाद पुलिस आरोपी को गिरफ्तार कर अदालत में पेश करती है, और अंततः मंच पर सांकेतिक फांसी दी जाती है।

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इस तरह का मंचन दर्शकों को यह समझाता है कि अपराध का अंत हमेशा दंड से होता है और समाज में न्याय की व्यवस्था कितनी महत्वपूर्ण है।

ब्रिटिश काल से जुड़ी 200 साल पुरानी परंपरा

फांसी वाली रामलीला की शुरुआत ब्रिटिश शासनकाल में हुई थी। उस दौर में अपराध और अन्याय के मामले बढ़ रहे थे, और इस नाट्य मंचन का उद्देश्य जनता को न्याय और कानून के महत्व से परिचित कराना था।

करीब 200 साल से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। आयोजकों के अनुसार, यह केवल धार्मिक कथा नहीं है, बल्कि समाज में नैतिक शिक्षा देने और अपराध पर अंकुश लगाने का भी एक जीवंत तरीका है।

इतिहासकार मानते हैं कि यह मंचन एक सांस्कृतिक दर्पण के रूप में कार्य करता है, जो दर्शकों को यह बताता है कि अपराध और दंड के बीच का संबंध समाज में हमेशा स्पष्ट रहना चाहिए।

दर्शकों की भारी भीड़ और उत्साह

इस बार भी फांसी वाली रामलीला को देखने हजारों लोग रामलीला मैदान में इकट्ठा हुए। दर्शकों में उत्सुकता और रोमांच का वातावरण था। आयोजकों का कहना है कि यह केवल एक नाटक नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन है, जो समाज को न्याय और सजा की गंभीरता से परिचित कराता है।

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बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इस दृश्य को देखने के लिए आए, क्योंकि यह न केवल मनोरंजन करता है, बल्कि लोगों के मन में न्याय व्यवस्था की महत्ता को भी स्थापित करता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

फांसी वाली रामलीला की महत्ता सिर्फ करनैलगंज तक सीमित नहीं है। यह परंपरा भारत की सांस्कृतिक विविधता को भी दर्शाती है। आम तौर पर रामलीला में भगवान राम और रावण की कथा दिखाई जाती है, लेकिन करनैलगंज की रामलीला ने इसे समाज सुधार और अपराध नियंत्रण के संदेश से जोड़कर विशिष्ट रूप दिया है।

इस मंचन से यह स्पष्ट संदेश जाता है कि अपराध चाहे कितना भी परिष्कृत क्यों न हो, अंततः उसे दंड का सामना करना ही पड़ता है। यही कारण है कि यह परंपरा वर्षों से लोगों के दिलों और मन में सम्मान और विश्वास के साथ जमी हुई है।

बदलते दौर में अपनी पहचान बनाए रखी

आज के समय में, जब मनोरंजन के साधन अत्यधिक आधुनिक हो चुके हैं, तब भी फांसी वाली रामलीला ने अपनी अलग पहचान बनाए रखी है। आयोजकों का कहना है कि यह मंचन नई पीढ़ी को न केवल इतिहास से जोड़ता है, बल्कि उन्हें न्याय और अपराध की गंभीरता का भी पाठ पढ़ाता है।

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इस अनोखी रामलीला का संदेश यह भी है कि समाज में कानून की कार्यवाही की प्रक्रिया स्पष्ट और न्यायपूर्ण होनी चाहिए। दर्शकों में यह विश्वास पैदा करना कि अपराध कभी भी अनजाने में बकाया नहीं रहता, इसका सबसे बड़ा उद्देश्य है।

गोंडा जिले के करनैलगंज की फांसी वाली रामलीला सिर्फ एक नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि समाज में न्याय और अपराध के बीच के संबंध को उजागर करने का एक अद्भुत माध्यम है। लगभग 200 साल पुरानी इस परंपरा ने दर्शकों को हमेशा यही संदेश दिया है कि अपराध का अंत दंड से ही होता है।

आज भी यह मंचन दर्शकों को मनोरंजन और शिक्षा दोनों का अनुभव देता है। यही कारण है कि यह परंपरा वर्षों से जीवित और प्रेरणादायक बनी हुई है। 

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