पत्रकार पर दबंगई का कहर : अवैध निर्माण उजागर करने की सज़ा, फर्जी मुकदमा और जानलेवा धमकियाँ

पत्रकार संजय सिंह राणा और अधिवक्ता संघ अध्यक्ष अशोक गुप्ता की संयुक्त तस्वीर

पत्रकार पर दबंगई का कहर : अवैध निर्माण उजागर करने की सज़ा?

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चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट

चित्रकूट। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाले पत्रकार एक बार फिर दबंगई की भेंट चढ़ते नज़र आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले से आई यह खबर मीडिया की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़ा कर रही है।

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समाचार दर्पण के वरिष्ठ पत्रकार संजय सिंह राणा ने अवैध निर्माण की सच्चाई उजागर की। इसके बाद प्रशासन ने कार्रवाई की और निर्माण कार्य रुकवा दिया। लेकिन सच बोलने की कीमत उन्हें पत्रकार को धमकी के रूप में चुकानी पड़ रही है।

अवैध निर्माण पर रिपोर्ट और प्रशासन की कार्रवाई

दरअसल, जिला अधिवक्ता संघ चित्रकूट के अध्यक्ष अशोक गुप्ता पर आरोप था कि वे बिना नक्शा पास कराए भवन निर्माण कर रहे हैं। पत्रकार संजय सिंह राणा ने लगातार रिपोर्टिंग करके इस मामले को उजागर किया।

उनकी रिपोर्ट पर प्रशासन ने संज्ञान लिया और संबंधित निर्माण कार्य को रोक दिया।

लेकिन यहीं से कहानी बदल गई। प्रशासन की इस कार्रवाई से बौखलाए अधिवक्ता संघ अध्यक्ष ने पत्रकार को चुप कराने के लिए हर संभव कोशिशें शुरू कर दीं।

फोन पर गालियाँ और जानलेवा धमकी

पत्रकार राणा ने अपने आवेदन में लिखा है कि 29 सितंबर 2025 को सुबह 11:38 बजे उन्हें फोन आया। यह कॉल अशोक गुप्ता के पुत्र प्रतीक गुप्ता की ओर से था।

पत्रकार का आरोप है कि कॉल के दौरान जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया और उन्हें गंदी गालियाँ दी गईं। प्रतीक गुप्ता ने कहा कि खबरें चलाना बंद करो, वरना गंभीर नतीजे भुगतने होंगे।

इतना ही नहीं, कुछ देर बाद खुद अशोक गुप्ता ने फोन लेकर धमकी दी और कहा कि अगर खबरें बंद नहीं की गईं तो पत्रकार को फर्जी मुकदमों में फंसा दिया जाएगा।

यही नहीं, जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि जिस मोबाइल नंबर से फोन आया, वह किसी और के नाम पर दर्ज है। इससे साफ होता है कि यह एक सुनियोजित साजिश थी ताकि पत्रकार को धमकी देकर डराया जाए और बाद में जिम्मेदारी से बचा जा सके।

पहले भी मिली धमकियाँ और हमले

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब पत्रकार को धमकी मिली हो।

संजय सिंह राणा ने कहा कि इससे पहले भी उन पर हमला कराया गया था। दबंग लोग उनके घर तक पहुँचे और खबरें बंद करने का दबाव बनाया।

लेकिन उन्होंने पत्रकारिता धर्म निभाते हुए सच दिखाना जारी रखा।

अब हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि उन्होंने अपने आवेदन में साफ-साफ लिखा है –

“यदि आज या भविष्य में मेरे साथ कोई अप्रिय घटना घटती है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी अशोक गुप्ता और प्रतीक गुप्ता की होगी।”

पत्रकार ने मांगी सुरक्षा और न्याय

इस घटना के बाद पत्रकार ने थाना कर्वी प्रभारी निरीक्षक से दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने और अपनी जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करने की गुहार लगाई है।

उनका कहना है कि वे अनुसूचित जाति से आते हैं और इस वजह से दबंगों के लिए उन्हें निशाना बनाना आसान हो गया है।

उन्होंने प्रशासन से स्पष्ट मांग की है कि यदि उन्हें न्याय और सुरक्षा नहीं मिली तो लोकतंत्र में पत्रकारिता करना नामुमकिन हो जाएगा।

लोकतंत्र और मीडिया की गरिमा पर संकट

लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि जब पत्रकार को धमकी खुलेआम दी जाएगी, तो लोकतंत्र कैसे सुरक्षित रहेगा?

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ, यानी मीडिया, तभी मजबूत रह सकता है जब पत्रकार स्वतंत्र रूप से बिना डर के सच सामने ला सकें।

यदि पत्रकारों को धमकाकर चुप कराया जाएगा, फर्जी मुकदमों में उलझाया जाएगा और उनकी सुरक्षा खतरे में होगी, तो यह लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करेगा।

प्रशासन की जिम्मेदारी और अग्निपरीक्षा

वहीं, यह मामला प्रशासन के लिए भी अग्निपरीक्षा है।

क्या प्रशासन दबंगों के सामने खड़ा होकर सच की आवाज़ की रक्षा करेगा, या फिर चुप्पी साध लेगा?

अगर प्रशासन पत्रकार की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करता, तो यह संदेश जाएगा कि सच बोलने वाले पत्रकार को धमकी मिलना आम बात है और कानून उनके साथ नहीं है।

सच बोलने की कीमत कितनी भारी?

आखिरकार, चित्रकूट का यह मामला केवल एक पत्रकार की लड़ाई नहीं है। यह पूरे मीडिया जगत के लिए चेतावनी है कि सच दिखाने की राह कितनी कठिन और खतरनाक हो सकती है।

👉 बड़ा सवाल यही है –

“क्या सच बोलने वाले पत्रकार को धमकी और मुकदमे ही मिलते रहेंगे?”

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