भैरव से हुई भोर, परिंदों की चहचहाहट संग बंगाली गीतों में डूबी लखनऊ की शाम — यह वाक्य किसी पोस्टर की पंक्ति नहीं, बल्कि उस दिन की अनुभूति है, जब लखनऊ ने संगीत को केवल सुना नहीं, उसे अपने भीतर घटित होते महसूस किया। कैसरबाग के राजा रामपाल सिंह पार्क में आयोजित सनतकदा फेस्टिवल का ‘सहर’ कार्यक्रम इस अर्थ में विशेष रहा कि उसने शहर की स्मृति, मौसम और मन—तीनों को एक ही सुर में बांध दिया।
हूक प्वाइंट: सर्द भोर में राग भैरव की गंभीरता, सरोद-तबले का आत्मीय संवाद और शाम को बंगाली भक्ति-गीतों की भावनात्मक ऊष्मा — लखनऊ ने एक ही दिन में संगीत के कई जीवन देखे।
भोर, ठंड और राग — जब समय थम-सा गया
रविवार की वह सुबह किसी जल्दबाज़ी में नहीं थी। सर्द हवा में हल्की नमी थी, पेड़ों पर बैठे पक्षी अपने स्वाभाविक सुरों में थे और पार्क में जमा श्रोता किसी प्रदर्शन की प्रतीक्षा में नहीं, बल्कि एक अनुभव के लिए आए थे। जैसे ही राग भैरव की पहली आलापी सरोद से निकली, माहौल में एक अनकहा मौन उतर आया।
यह भैरव केवल राग नहीं था, यह जागरण था — भीतर की चेतना को जगाने वाला। लखनऊ-शाहजहांपुर घराने के खलीफा उस्ताद इरफान मोहम्मद खान ने जिस ठहराव और संयम से इस राग को खोला, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि यह प्रस्तुति शोर के लिए नहीं, सुनने वालों के भीतर उतरने के लिए है।
संगीत और शहर के रिश्ते पर एक ज़रूरी बात
कार्यक्रम की शुरुआत में भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. मांडवी सिंह ने लखनऊ और संगीत के रिश्ते पर जो बात कही, वह केवल औपचारिक वक्तव्य नहीं थी। उन्होंने कहा कि लखनऊ को अगर समझना है, तो उसकी इमारतों से नहीं, उसके सुरों से शुरुआत करनी होगी।
उनकी यह बात मंच पर आगे जो घटित हुआ, उससे लगातार प्रमाणित होती रही। यह आयोजन दिखाता है कि लखनऊ में संगीत अब भी विरासत नहीं, जीवित अभ्यास है।
सरोद और तबले के बीच संवाद, प्रदर्शन नहीं
राग भैरव के बाद प्रस्तुति राग भैरवी की ओर बढ़ी। यहां सरोद की मींडें और तबले की थाप एक-दूसरे के ऊपर चढ़ने के बजाय साथ-साथ चलती रहीं। लखनऊ घराने के खलीफा उस्ताद इल्मास हुसैन खान ने उठान, कायदा, रेला और तिहाई के माध्यम से यह दिखाया कि संगति भी साधना होती है।
विशेष रूप से ‘रंग’ की प्रस्तुति ने यह स्पष्ट किया कि लखनऊ घराना केवल तकनीक नहीं, भाव की भी परंपरा है। यह संगीत सुनने वाले को प्रभावित नहीं करता, धीरे-धीरे अपने में शामिल कर लेता है।
शाम ने बदला मिज़ाज, सुरों ने ओढ़ी भावनाओं की चादर
शाम होते-होते कार्यक्रम का रंग बदला, लेकिन उसकी गंभीरता बनी रही। बोर्नो अनन्यो की प्रस्तुति ने माहौल को एक आध्यात्मिक और भावनात्मक दिशा दी। दुरबी शाह का गीत ‘नमाज अमार होइलो नाम अदाय’ जैसे ही गूंजा, श्रोता किसी धार्मिक पहचान में नहीं, बल्कि मनुष्य और ईश्वर के सीधे संवाद में पहुंच गए।
यह गीत कर्मकांड से परे, आंतरिक सच्चाई की बात करता है — और यही उसकी सबसे बड़ी ताक़त है।
विरह, धैर्य और राधा की चुप पुकार
चंडी दास की रचना ‘धैरयो जो नाम धुरिते’ में राधा का स्वर सुनाई देता है — जो अपने मन को धैर्य रखने की सीख देती है, लेकिन भीतर का विरह छुपता नहीं। बोर्नो अनन्यो की गायकी में यह रचना नाटकीय नहीं बनी, बल्कि सहज और गहरी रही।
यही इस शाम की विशेषता थी — यहां भावनाओं को उछाला नहीं गया, उन्हें धीरे-धीरे खुलने दिया गया।
यह कार्यक्रम क्या कह गया?
सनतकदा फेस्टिवल का यह दिन यह कह गया कि संगीत आज भी शहरों को उनकी आत्मा से जोड़ सकता है। भैरव से शुरू हुई भोर और बंगाली गीतों में डूबी शाम ने यह याद दिलाया कि लखनऊ का स्वभाव अब भी सुनने वाला है — तेज़ नहीं, गहरा।
ऐसे आयोजन केवल कार्यक्रम नहीं होते, ये स्मृति बनते हैं। और शायद यही किसी शहर के लिए सबसे ज़रूरी होता है।










