बाढ़ की विभीषिका ; 30 लाख एकड़ कृषि भूमि में उपज रहे धान, सोयाबीन और दलहन जैसी मुख्य फसलें जलमग्न

गडचिरोली में बाढ़ की विभीषिका से डूबा घर और टूटी सड़क का दृश्य

बाढ की विभीषिका ; 30 लाख एकड़ कृषि भूमि जलमग्न

सदानंद इंगिली की रिपोर्ट

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महाराष्ट्र का गडचिरोली जिला इस समय बाढ़ की विभीषिका से गुजर रहा है। लगातार हो रही मूसलधार बारिश ने नदियों का जलस्तर बढ़ा दिया है और आसपास के गाँव पूरी तरह जलमग्न हो गए हैं। लोग सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए मजबूर हैं, तो वहीं प्रशासन राहत और बचाव कार्यों में जुटा हुआ है। बाढ़ की विभीषिका ने न केवल जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है बल्कि कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर भी गहरा असर छोड़ा है।

गडचिरोली में बाढ़ की विभीषिका: हालात, नुकसान और राहत कार्य

गडचिरोली जिले में इस साल औसत से कहीं अधिक बारिश दर्ज की गई है। खासकर भामरगड क्षेत्र में पार्लकोटा नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर चला गया, जिसके कारण सौ से अधिक गाँव बाकी हिस्सों से कट गए। कई पुल और सड़कें डूब जाने से ग्रामीणों का बाहर की दुनिया से संपर्क टूट गया है। लोगों को राशन और दवाइयाँ पहुँचाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। प्रशासन ने लगातार अपील जारी कर निचले इलाकों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने का प्रयास किया है।

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नुकसान का आकलन

बाढ़ की विभीषिका ने सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को पहुँचाया है। धान और दलहन की फसलें पूरी तरह जलमग्न हो गई हैं। हजारों एकड़ जमीन पर खड़ी फसल नष्ट हो चुकी है, जिससे किसानों का सालभर का परिश्रम व्यर्थ चला गया। मिट्टी कटाव ने आने वाले सीजन की उपजाऊ क्षमता पर भी गंभीर असर डाला है।

कृषि के अलावा, हजारों परिवारों के घर भी बाढ़ के पानी में बह गए या ढह गए। कच्चे-पक्के मकानों की दीवारें टूट गईं और कई गाँव के लोग अब बेघर होकर राहत शिविरों में आश्रय लेने को मजबूर हैं। स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र जैसे सार्वजनिक भवन भी जलमग्न हो गए, जिससे बच्चों की पढ़ाई और ग्रामीणों की स्वास्थ्य सेवाएँ पूरी तरह ठप हो गईं। बिजली और पेयजल आपूर्ति बाधित हो जाने से आम नागरिकों का जीवन और भी कठिन हो गया है।

जनहानि की दृष्टि से भी यह बाढ़ की विभीषिका भयावह रही है। अब तक कई लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि दर्जनों लोग घायल हैं। हजारों लोग अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर शरण ले रहे हैं। दूषित पानी के कारण हैजा, मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है, जिससे स्वास्थ्य विभाग की चिंता और बढ़ गई है।

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प्रशासनिक राहत कार्य

प्रशासन ने हालात से निपटने के लिए त्वरित कदम उठाए हैं। एसडीआरएफ की टीमों को प्रभावित इलाकों में तैनात किया गया है। हेलिकॉप्टरों की मदद से उन लोगों को एयरलिफ्ट किया गया जो पूरी तरह पानी से घिरे गाँवों में फँसे हुए थे। राहत शिविरों में भोजन, पानी और दवाइयों की व्यवस्था की गई है। साथ ही, स्थानीय स्वयंसेवी संगठन भी प्रशासन की मदद कर रहे हैं।

राज्य सरकार ने किसानों और बाढ़ प्रभावितों के लिए विशेष राहत पैकेज की घोषणा की है। केंद्र से अतिरिक्त सहायता की मांग भी की गई है, ताकि पुनर्वास और क्षतिपूर्ति का काम तेज़ी से हो सके। हालांकि, राहत वितरण में अभी भी कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं, क्योंकि कटे हुए गाँवों तक पहुँचना बेहद कठिन है।

स्वास्थ्य और पर्यावरणीय प्रभाव

बाढ़ की विभीषिका ने न केवल इंसानी जीवन को प्रभावित किया है बल्कि पर्यावरण पर भी गहरा असर डाला है। पानी भर जाने से पशुधन की मौतें बढ़ गई हैं और हजारों मवेशी बह गए या बीमार पड़ गए हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर और अधिक दबाव पड़ा है। खेतों में जमा गाद और कीचड़ भूमि की उर्वरता को कम कर रहे हैं।

स्वास्थ्य की दृष्टि से हालात बेहद गंभीर हो रहे हैं। दूषित पानी से बीमारियों के फैलने का खतरा बना हुआ है। राहत शिविरों में पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है, जिससे लोग और अधिक परेशान हो रहे हैं। डॉक्टरों की टीमें लगातार गाँव-गाँव जाकर लोगों की जाँच कर रही हैं, लेकिन संसाधनों की कमी बड़ी चुनौती बनकर सामने खड़ी है।

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भविष्य की चुनौतियाँ

गडचिरोली में आई बाढ़ की विभीषिका ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आपदा प्रबंधन की व्यवस्था को और मजबूत बनाने की ज़रूरत है। राहत कार्यों के साथ-साथ दीर्घकालीन रणनीतियाँ अपनाना समय की मांग है। नदियों और नालों की सफाई, बांधों की मरम्मत और बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली को प्रभावी बनाना जरूरी है। ग्रामीण स्तर पर आपदा प्रबंधन समितियाँ बनाकर स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित करना होगा, ताकि भविष्य में इस तरह की आपदाओं का बेहतर सामना किया जा सके।

गडचिरोली में बाढ़ की विभीषिका ने जनजीवन की कठिनाइयों को उजागर कर दिया है। फसलें बर्बाद हो गईं, घर ढह गए, स्वास्थ्य संकट गहरा गया और हजारों लोग बेघर हो गए। प्रशासन राहत कार्यों में जुटा है, लेकिन लंबे समय तक चलने वाले पुनर्वास की चुनौती सामने है। यह आपदा इस बात की चेतावनी है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में ऐसी परिस्थितियाँ और भी भयावह हो सकती हैं।

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