बैंक रिटायरीज़ पेंशन सुधार को लेकर सरकारी बैंकों से सेवानिवृत्त कर्मचारियों और अधिकारियों का सब्र अब टूटता नजर आ रहा है। दशकों से लंबित पेंशन पुनरीक्षण और अद्यतन की मांग को लेकर आजमगढ़ में आयोजित धरना-प्रदर्शन केवल एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि देशव्यापी असंतोष की एक मजबूत कड़ी के रूप में सामने आया है। यह आंदोलन न सिर्फ आर्थिक अधिकारों की बात करता है, बल्कि सामाजिक न्याय, सम्मान और संवैधानिक बराबरी के सवाल भी खड़े करता है।
सरकारी बैंकों के सेवानिवृत्त कर्मचारियों ने पेंशन पुनरीक्षण की वर्षों पुरानी मांग को लेकर आजमगढ़ में धरना-प्रदर्शन किया। नेताओं ने इसे मौलिक अधिकारों से जुड़ा प्रश्न बताते हुए देशव्यापी आंदोलन तेज करने का संकेत दिया।
धरना-प्रदर्शन के जरिए जताई गई वर्षों की पीड़ा
आजमगढ़ में आयोजित इस धरना-प्रदर्शन में बड़ी संख्या में सरकारी बैंकों के सेवानिवृत्त कर्मचारी और अधिकारी शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान यूनियन बैंक के दोनों क्षेत्र प्रमुखों को ज्ञापन सौंपा गया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उन्होंने अपने कार्यकाल में बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत करने में जीवन का बड़ा हिस्सा लगा दिया, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद वही व्यवस्था उन्हें लगातार उपेक्षित कर रही है।
1995 की पेंशन योजना और अधूरे वादे
वक्ताओं ने बताया कि वर्ष 1995 में लागू पेंशन योजना मुख्यतः कर्मचारियों के अपने भविष्य निधि फंड पर आधारित थी। उस समय यह आश्वासन भी दिया गया था कि समय-समय पर पेंशन का पुनरीक्षण और अद्यतन किया जाएगा, ठीक उसी प्रकार जैसे रिजर्व बैंक में किया जाता है। लेकिन व्यवहार में यह प्रावधान केवल कागजों तक सीमित रह गया।
फंड की कमी या इच्छाशक्ति का अभाव?
धरना स्थल पर वक्ताओं ने सरकार और बैंक प्रबंधन पर फंड की अनुपलब्धता का बहाना बनाकर जिम्मेदारी से बचने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि जब प्रत्येक सरकारी योजना का क्रियान्वयन बैंकों के माध्यम से होता है, तब उन्हीं बैंकों के पेंशनर्स को बोझ मानना एक विरोधाभासी और निराशाजनक रवैया है।
समानता के सिद्धांत पर उठते सवाल
प्रदर्शन के दौरान यह सवाल प्रमुखता से उठा कि जब समान पेंशन योजना के आधार पर रिजर्व बैंक और नाबार्ड में पेंशन पुनरीक्षण संभव है, तो सरकारी बैंकों में क्यों नहीं। वक्ताओं ने इसे द्विपक्षीय समझौतों के उल्लंघन के साथ-साथ प्राकृतिक न्याय और मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताया।
आंदोलन अब निर्णायक मोड़ की ओर?
नेताओं ने स्पष्ट संकेत दिए कि यह आंदोलन केवल प्रतीकात्मक नहीं रहेगा। इसे अखिल भारतीय स्तर पर और अधिक संगठित एवं प्रभावशाली बनाया जाएगा। पेंशनर्स ने दो टूक कहा कि वे अपनी न्यायोचित मांगों के लिए हर स्तर का संघर्ष करने को तैयार हैं।
वरिष्ठ नागरिकों का सम्मान भी दांव पर
इस आंदोलन ने एक व्यापक सामाजिक प्रश्न भी खड़ा किया है — क्या देश की बैंकिंग व्यवस्था को खड़ा करने वाले वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानजनक जीवन का अधिकार नहीं मिलना चाहिए? प्रदर्शनकारियों का कहना था कि पेंशन केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक है।
देशव्यापी आंदोलन की आहट
आयोजकों ने बताया कि इस तरह के धरना-प्रदर्शन देशभर में चल रहे हैं और आने वाले समय में इन्हें और तेज किया जाएगा। पेंशनर्स का मनोबल ऊंचा है और वे किसी भी तरह की कुर्बानी देने के लिए मानसिक रूप से तैयार हैं।
उपस्थिति और एकजुटता का संदेश
धरना-प्रदर्शन में विभिन्न बैंकों के सेवानिवृत्त अधिकारी और कर्मचारी बड़ी संख्या में मौजूद रहे। यह उपस्थिति इस बात का संकेत थी कि पेंशन सुधार का मुद्दा किसी एक संगठन या शहर तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे बैंकिंग सेवानिवृत्त वर्ग की साझा आवाज बन चुका है।








