ग्राम प्रधान की लापरवाही को लेकर ग्राम पंचायत सकलनपुर, सरैया राह इन दिनों स्थानीय चर्चा का केंद्र बनी हुई है। सीतापुर से लखीमपुर को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित गौशाला से एक गौ माता का सड़क पर आ जाना और फिर दुर्घटना का शिकार हो जाना, केवल एक आकस्मिक घटना नहीं मानी जा रही। ग्रामीणों और स्थानीय जानकारों का कहना है कि यह हादसा लंबे समय से चली आ रही अनदेखी और प्रशासनिक शिथिलता का प्रत्यक्ष परिणाम है।
गौरतलब है कि जिस गौशाला से यह घटना जुड़ी है, वह सीधे राष्ट्रीय राजमार्ग से सटी हुई है। ऐसे संवेदनशील स्थान पर गौशाला का संचालन अतिरिक्त सावधानी, मजबूत चारदीवारी, नियमित निगरानी और जिम्मेदार प्रबंधन की मांग करता है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखाई देती है। यहीं से ग्राम प्रधान की भूमिका और उनकी जवाबदेही पर सवाल खड़े होते हैं।
राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे गौशाला: खतरे की अनदेखी क्यों?
राष्ट्रीय राजमार्ग जैसे व्यस्त और तेज रफ्तार वाहनों वाले मार्ग के किनारे गौशाला होना अपने आप में एक संवेदनशील स्थिति है। नियमों और दिशा-निर्देशों के अनुसार, ऐसी जगहों पर पशुओं को सड़क पर जाने से रोकने के लिए मजबूत बाड़बंदी, गेट सिस्टम और चौकीदार की व्यवस्था अनिवार्य मानी जाती है। इसके बावजूद सकलनपुर की गौशाला में ये इंतजाम या तो अधूरे हैं या पूरी तरह नदारद।
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार गौवंश को सड़क की ओर जाते देखा गया, लेकिन इस चेतावनी को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। यदि समय रहते इस खतरे को समझकर ठोस कदम उठाए गए होते, तो शायद यह दुर्घटना नहीं होती। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या ग्राम प्रधान ने संभावित जोखिमों का आकलन किया भी था?
ग्राम प्रधान की जिम्मेदारी: कागजों में या जमीन पर?
पंचायती राज व्यवस्था के तहत गौशाला की देखरेख, संचालन और सुरक्षा की मुख्य जिम्मेदारी ग्राम पंचायत और ग्राम प्रधान की होती है। सरकारी योजनाओं के अंतर्गत गौशालाओं के लिए धनराशि भी आवंटित की जाती है, ताकि पशुओं की सुरक्षा, चारा-पानी और बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जा सके। लेकिन सकलनपुर की घटना यह संकेत देती है कि जिम्मेदारी शायद केवल कागजी रिपोर्टों तक सीमित रह गई।
यह सवाल भी उठ रहा है कि गौशाला के लिए मिले संसाधनों का वास्तविक उपयोग किस हद तक हुआ। यदि चारदीवारी और निगरानी जैसी मूलभूत व्यवस्थाएं मौजूद होतीं, तो गौ माता का हाईवे तक पहुंचना ही संभव नहीं होता। ग्राम प्रधान की भूमिका पर उठ रहे ये सवाल प्रशासनिक जवाबदेही की मांग करते हैं।
ग्रामीणों का आक्रोश: पहले भी दी गई थी चेतावनी
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, यह पहली बार नहीं है जब गौशाला की अव्यवस्था को लेकर आवाज उठी हो। कई बार पंचायत स्तर पर मौखिक शिकायतें की गईं, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि समय रहते उनकी बातों पर ध्यान दिया गया होता, तो यह हादसा टल सकता था।
घटना के बाद गांव में नाराजगी का माहौल है। लोग यह पूछ रहे हैं कि गौ माता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई गौशाला आखिर किस काम की, जब वही पशु असुरक्षित होकर सड़क पर जान गंवाने को मजबूर हों।
प्रशासनिक निगरानी पर भी सवाल
हालांकि सीधे तौर पर जिम्मेदारी ग्राम प्रधान की बनती है, लेकिन इस पूरे मामले में उच्च स्तर की प्रशासनिक निगरानी की कमी भी उजागर होती है। गौशालाओं का समय-समय पर निरीक्षण, सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा और आवश्यक सुधार प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। यदि ये प्रक्रियाएं प्रभावी ढंग से लागू होतीं, तो लापरवाही समय रहते सामने आ जाती।
यह घटना इस बात की ओर भी इशारा करती है कि ग्रामीण स्तर की योजनाएं तभी सफल हो सकती हैं, जब जमीनी निगरानी मजबूत हो और जिम्मेदारों से जवाबदेही तय की जाए।
गौ संरक्षण की मंशा बनाम जमीनी हकीकत
सरकारी स्तर पर गौ संरक्षण को लेकर बड़ी-बड़ी घोषणाएं की जाती हैं। गौशालाओं को गौ माता के सुरक्षित आश्रय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन सकलनपुर की यह घटना बताती है कि नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर है। जब तक स्थानीय स्तर पर जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक गौ संरक्षण केवल एक नारा बनकर रह जाएगा।
ग्राम प्रधान की लापरवाही केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी की भी अनदेखी मानी जा रही है। गौ माता की सुरक्षा से जुड़ा यह मामला पूरे पंचायत तंत्र के लिए एक चेतावनी की तरह है।
अब आगे क्या?
घटना के बाद ग्रामीण प्रशासन से जांच और कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि गौशाला की स्थिति की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए और यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है। यदि ग्राम प्रधान की लापरवाही साबित होती है, तो भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
यह मामला केवल सकलनपुर तक सीमित नहीं है। यह उन तमाम पंचायतों के लिए एक चेतावनी है, जहाँ गौशालाएं केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं। सवाल यह है कि क्या इस हादसे के बाद व्यवस्था जागेगी, या फिर अगली दुर्घटना का इंतजार किया जाएगा।






